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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 80, मार्च(प्रथम), 2020

तरकीब!

लीला तिवानी

”दादी मां, आज मैं अपने दोस्त को घर ला सकती हूं?” पोती ने पूछा.

”आजकल तो जमाना बदल गया है, पर तुम्हारी बात सुनकर मुझे 50 साल पुराना अपना किस्सा याद हो आया.” दादी मां की यादों का पिटारा खुल गया. पोती भी सुनने को उत्सुक थी.

”हुआ यह कि एक बार मैं जब कॉलेज में पढ़ती थी, ट्रेन में अकेले सफर कर रही थी. बहुत भीड़ होने के कारण बिना देखे जहां जगह मिली बैठ गई. सामने कॉलेज के चार लड़के बैठे थे.”

”दादी मां, बड़ा अद्भुत नजारा होगा! हूर-सी मेरी दादी मां और कॉलेज के चार लड़के!”

”हट शैतान कहीं की!” दादी मां ने प्यार से झिड़कते हुए कहा, ”ऐसे घूर के देख रहे थे कि उस समय तो मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई थी, शुक्र है समझ ने साथ नहीं छोड़ा.”

”चलो बहुत अच्छा हुआ, फिर क्या हुआ दादी मां? जल्दी बताओ.” पोती ने छेड़ते हुए कहा.

”वे सिगरेट पीने लगे. मेरा ही नहीं, सभी का दम घुटने-सा लगा था. मैंने उनसे सिगरेट बंद करने का निवेदन किया, लेकिन वे कहां मानने वाले थे! एक लड़के ने पूछा, आप कहां जा रही हैं? मैंने सही-सही बता दिया अंबाला. बाकी नाम-पता-फोन नंबर-पिताजी का काम वगैरह सब गलत बताया. पिताजी का काम बड़े मिलिटरी ऑफीसर सुनकर उनकी अकड़ ढीली हो गई.”

”वाह दादी मां, आप तो उस समय भी बड़ी स्मार्ट निकलीं! फिर क्या हुआ?”

”फिर क्या मुझे चाय भी ला दी, खाना भी ला दिया, वाशरूम जाने के लिए लोगों को इधर-उधर हटवाकर रास्ता भी बनवा दिया. जब मुझे ट्रेन बदलनी थी, तो मेरे साथ चलकर मुझे घर तक छोड़ने के लिए आमादा हो गए.”

”वाह!”

”ऐसा है, कि अंबाला से आपको फिर उल्टा आना पड़ेगा, दूसरे आप लोग मुझे घर तक छोड़ने के लिए चलेंगे, तो मेरे घरवाले और पड़ोसी क्या सोचेंगे! आपने यहां तक भीड़ से बचाकर मेरी मदद की, बहुत-बहुत शुक्रिया. आगे तो मेरा अपनी ही जाना-पहचाना इलाका है, मुझे कोई दिक्कत नहीं होगी.” कल को मुझे अपने फैसले पर अफसोस न करना पड़े, यही सोचकर मैंने विनम्रता से कहा.

”वाह क्या तरकीब है! इंकार करो, मगर प्यार से! अच्छा दादी मां, मैं कॉलेज चलती हूं, मैं भी कोई ऐसी तरकीब निकालूंगी, ताकि उसे घर आने के लिए इंकार भी न करना पड़े और कल को मुझे अपने फैसले पर अफसोस भी न हो,” पोती सुरक्षित भविष्य के लिए तैयार हो गई थी.


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