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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 62, जून(प्रथम), 2019

मज़हब

शुचि 'भवि'

"दादी,क्या करती हो,आपको ऐसे नहीं करना चाहिए था।वो मेरी सबसे पक्की सहेली है,कितना अपमान किया आपने उसका।जाओ हम नहीं करेंगे अब आपसे कोई बात।",कहते हुए निशा दादी के कमरे से चली गयी थी।ये पहली बार नहीं हुआ था आज,बचपन से निशा अपनी दादी का अपनी मुसलमान व अन्य धर्मों की सहेलियों के प्रति यही व्यवहार देखते आ रही थी।बस अब वह नर्म विरोध करने लगी थी।

फरहीन आज आँखों में आँसू लिए निशा के घर से चुपचाप तब चली गयी थी जब दादी निशा को डाँटते हुए बोली थीं कि फरहीन को तुम पूजा वाले कमरे में क्यों ले गयीं थीं मेरे मना करने के बावज़ूद?

फरहीन निशा के घर आकर गीता पढ़ा करती थी और तक़रीबन हर धर्म का सार जानने की उसकी कोशिश रहती थी। कॉलेज में बी.एस सी. तृतीय में पढ़ने वाली फरहीन,निशा की बचपन की सहेली है जो दो मकान छोड़ कर रहती है।दोनों साथ ही एग्जाम की तैयारी भी करती हैं किसी एक के घर पर इकट्ठे ही।

आज निशा फरहीन के घर पर पढ़ने के लिए रात रुकी है।निशा का मोबाइल बज रहा है मगर नींद पहले फरहीन की खुली।फ़ोन पर दादी का नाम पढ़, रात फरहीन ने तुरंत फ़ोन रिसीव किया।दादी के करहाने की आवाज़ सुन, वह तुरंत ही बगल के कमरे में सो रहे अपने भाई सादिक़ को लेकर,दादी के घर की तरफ़ दौड़ पड़ी।रात के तीन बज रहे थे और निशा देर रात तक पढ़ी थी इसलिए फरहीन ने उसे डिस्टर्ब नहीं किया था।

पूजा कक्ष के बाहर की सीढ़ी पर दादी गिर गईं थी।फरहीन उन्हें सहारा देकर जब उठा रही थी तो दादी ने पूजा कक्ष में ले जाने का आग्रह किया।फरहीन के पाँव मानो जम से गये थे।दादी कहे जा रहीं थी निशा सुनती क्यों नहीं मुझे ले कर चल जल्दी,मेरे गोपाला ही मुझे ठीक करेंगे,मेरी पूजा का समय हो रहा है।पाठ करूँगी वहीं बैठ कर।आज बत्ती गुल है इसलिए लाठी सीढ़ी से फिसल गई थी।

फरहीन,सादिक़ के साथ मिलकर कराहती दादी को पूजा कक्ष तक ले आयी थी।आवाज़ सुन अब तक निशा के माँ-पिताजी भी जग गये थे और पूजा कक्ष में आ गए थे जहाँ दादी को फरहीन गीता के श्लोक मुँहज़बानी सुना रही थी।

लाइट आते ही फरहीन को देख दादी आश्चर्यचकित थीं और शर्मिंदा भी।


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