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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 62, जून(प्रथम), 2019

अब्बा का चश्मा

अखतर अली

अब्बा पल भर भी चश्मे को अपने से अलग नहीं करते थे | ज़रा भी चश्मा इधर उधर होता तो हल्ला मचा देते मेरा चश्मा गुम गया , ढूंढ कर लाओ , और जो भी ढूंढ कर लाता उसे प्यार की झप्पी देते | अब्बा और चश्मे का रिश्ता भी बड़ा दिलचस्प था , मानो दोनों को एक दूसरे के बिना चलता न हो , चश्मा जब भी गुमता पांच मिनट में मिल जाता , मानो वह खुद अब्बा को ढूंढ रहा हो | फिर इस लुका छिपी के खेल को बरसो बीत गये , मै सब कुछ भूल गया था |

एक दिन अचानक मेरा अपने उस पुराने बंद मकान में जाना हुआ | दरवाज़ा खोलकर अंदर कमरे में कदम रखा ही था कि सामने खिड़की पर अपनी पुरानी जगह पर रखा वह चश्मा दिख गया | मैंने ही चश्मे को नहीं बल्कि चश्मे ने भी मेरे को पहचान लिया | मैंने देखा चश्मे की आँख में आंसू थे और वो सिसक सिसक कर कह रहा था अब्बा गुम गये ढूंढ कर लाओ |


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