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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 63, जून(द्वितीय), 2019

प्रिय होता तरबूज...

विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र'

गर्मी में प्रिय है लगे, गुणी जो बेमिसाल । बाहर-बाहर हरित जो, भीतर-भीतर लाल ।। ज्योति बढ़ाये आँख की, पौष्टिकता का द्वार । प्राकृतिक ठण्डाई का, है अनुपम उपहार ।। करे शीघ्र पाचन सदा, हरे मानसिक श्रम । लू से छुटकारा मिले, रक्त चाप करे कम ।। सुन्दरता का मायना, चेहरा दे निखार । मिटे रोग सेवन करें, गर्मी वैद्य शुमार ।। मौसम गरमी में सदा, प्रिय होता तरबूज । कुछ बातें बूझी यहाँ, कुछ रह गयी अबूझ ।। ना खाये कप रोग में, त्याज्य निशा के मध्य । कविता में कवि ने कहा, आयुर्वेदिक कथ्य ।।


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