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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 63, जून(द्वितीय), 2019

बुंदेली दोहे
काकी कक्का की नौक झोंक

सुशील शर्मा

कान लगा के सुन रहे ,कक्का हमरी बात। काकी ने बगरा दओ ,आके पूरो भात। काय सुनो प्रीतम तनक ,हम से कर लो बात। अकल अजीरन हो गओ ,दिन भर से बतयात। भाग हमारे का कहें ,ब्याह लई जा नार। जीबे से मरबो भलो ,जनम जिंदगी रार। सुन मुन्ना कक्का कहें ,बिलकुल सूधी बात। छाती पर पथरा धरो , ले जईओ बरात। दिन भर घर में बैठ के ,करिओ ने कछु काम। बात बतोले भांझ के ,करिओ फिर आराम।


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