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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 63, जून(द्वितीय), 2019

दोहे

सतविन्द्र कुमार राणा

धरती तप कर कह रही, सूख रहे हैं ताल सोखे की इस पीर का, कारण मायाजाल। मनुज कृत्य हैं दनुज सम, लील लिए हैं पेड़ बिन वन वर्षा दूर है, गर्मी रही उधेड़। जल बिन धरती जल रही, जल-जल रही कराह जलद जल्द जल जोड़ कर, बरसे बस यह चाह। घर-आँगन में स्थान हो, चौड़ी हो यदि छात गमले फूल लगाइए, हो हरियाली भ्रात। जितना हमको चाहिए, उतना बरतें नीर आज व्यर्थ जितना बहा, कल उतनी ही पीर। केवल रोपण कर रहे, करते नहीं सँभाल ऐसे में कैसे बचे, तप से बोलो खाल।


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