Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 39, जून(द्वितीय), 2018



चुनाव नहीं ,अब तो ये व्यापार हो गया


हेमंन्त सिंह


 
चुनाव नहीं ,अब तो ये व्यापार हो गया ..
बदनाम तो था पहले ही ,अब बेकार हो गया।

कुत्तों की तरह वोट पर नेता झपट रहे..
कुत्ता भी इन्हें देख शर्मशार हो गया ।

कहीं मुर्गा ,कहीं मदिरा, कहीं मुद्रा दिखा रहे..
इससे भला तो देह का व्यापार हो गया।

सारे मुखौटे उड़ रहे हर राज खुल रहा..
जयचन्द था गोरी का तरफदार हो गया।

कुछ सियासत यूँही दिखलाएगी नए ...
देखो तो इक नचनिया भी सरकार हो गया।

हर वोट की कीमत है यहाँ चंद रुपय्या..
जनतंत्र जैसे चाइना बाज़ार हो गया ।

भेड़ो की तरह रात में पाल्हा बदल लिया....
इस पार का जो माल था उस पार हो गया ।

हम गालियाँ ही दे रहे, मजबूर क्या करे..
रद्दी पड़ा कागज़ अभी अखबार हो गया।

"गन्दी है राजनीति" इससे दूर ही रहना ...
इस सोच से भारत का बंटाधार हो गया।.....		 
 

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें