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वर्ष: 2, अंक 39, जून(द्वितीय), 2018



मेरा ‘मैं’


राजीव कुमार


मेरा ‘मैं’ मुझसे हमेशा कहता रहा, ‘‘हमको ये चाहिए, हमको वो चाहिए। ऐसा होने पर खुश होऊंगा और ऐसा न होने पर उदास होऊंगा। यह रास्ता लंबा है, देर से पहुंचूंगा। ये रास्ता छोटा है, जल्दी पहुंचूंगा।’’

मेरा ‘मैं’ इतना खोटा निकला कि कहीं सस्ते में नहीं चला। हमको कहीं का भी नहीं छोड़ा। हर मंजिल नजदीक आकर भी दूर होती गई। संघर्ष का सफर कभी खत्म ही नहीं हुआ। हालत बद से बदतर होती चली गई।

अब पछताता हूं और सोचता हूं कि मेरा ‘मैं’ मुझसे दूर हो जाए तो मैं आदमी हूं या मेरा ‘मैं’ मुझसे चिपका रहे तो मैं आदमी हूं?


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