Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 39, जून(द्वितीय), 2018



खरीदार


राजीव कुमार


अपनी बीमार बेटी की तबीयत ज्यादा खराब जानकर नारायण काका ने अपने भाग्य को कोसा और उस खरीददार पर मन ही मन क्रोधित हुए।

चाय की एक सिप लेकर नारायण काका ने सारी बात अपनी पत्नी को बताई तो उनकी पत्नी ने समझते हुए कहा, ‘‘गुस्सा और चिंता छोड़ दीजिए मुन्नी के पापा, भगवान सब ठीक करेंगे। अपने दो सौ रुपए पचाकर वो खरीददार चैन से नहीं रहेगा।’’

कुछ दिनों से बीमार चल रहे नारायण काका के सामने जब वही खरीददार आया तो उन्होंने गुस्साते हुए कहा, ‘‘दुकान बंद थी तो ठगने के लिए घर तक चला आया? उन दो सौ रुपए से बेटी के लिए कम से कम दवा तो आ जाती, इलाज तो बहुत महंगा है। जाओ बाबू, जाओ, तुम क्या समझोगे दूसरे की तकलीफ।’’

उस आदमी ने दो सौ रुपया काका की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘ये रुपए गलती से मेरे पास रह गए थे, मगर वह फूलदान सही जगह पर पहुंच गया। मेरे खास मित्र ने अपनी कला प्रदर्शनी में शामिल कर लिया है। भगवान ने चाहा तो आपकी बेटी का इलाज का भी सारा बंदोबस्त हो जाएगा।’’

नारायण काका ने अपनी पत्नी की तरफ देखकर उस आदमी का हाथ चूमते हुए कहा, ‘‘तू खरीददार नहीं अवतार निकला।’’


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें