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वर्ष: 2, अंक 39, जून(द्वितीय), 2018



पिपलिया भूत


नीना छिब्बर


उनींदा सा रविवार आरंभ ही हुआ था कि पूरे मोहल्ले मे खिडकी, दरवाजे, झरोखों से बेताल की तार की तरह अनहोनी खबर फैल गई। सबके घरों के बाहर कुछ ना कुछ रखा हुआ था।कहीं मिट्टी के पुराने दीपक, कहीं पुराना केलेंडर, कहीं पुरानी टूटी मूर्तियाँ,कहीं सूखी फूलों की मालाए वह सब जो पीपल के चबूतरे पर इन घरों के सदस्यों ने रखा था । मोहल्ले के तथाकथित अंधविश्वासी लोग पीपल पर ऐसी वस्तुओं को रखकर पापमुक्त हो जाते थे।वह भी आज घबरा गए।

मंत्रणा हुई,अटकलें लगी, किसी शरारती बच्चे का काम, पडोसियों ने किया, भूत ने किया।मानव स्वभावानुसार थोडी देर बकबक झकझक फिर सारी वस्तुएं पीपल पर पुनः स्थापित।यही घटना जब निरंतर तीन चार दिन लगातार हुई तो सबका माथा ठनका।पक्का यकीन हुआ कि पिपलिया भूत ने किया।

सभी बाते बनाते, पर हररोज पीपल पर पुरानी वस्तुओं का अटाला रखते स्थिति इतनी बिगडी की पूज्यनीय पीपल के पास से गुजरना भी दूभर हो गया।अंततः कुछ समझदार वृद्ध एवं युवाओं ने मंत्रणा की। रविवार को पीपल को कचरा मुक्त किया। साफ चबूतरा चमका,पीपल मुसकुराया। सब अब सुबह जल्दी जागे ,घर के बाहर कोई वस्तु नही। लोग प्रसन्न, पीपल अति प्रसन्न । मन ही मन पिपलिया भूत बोला जो दो वो लो। अब हुई स्वच्छ भारत की शुरुआत।


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