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वर्ष: 2, अंक 39, जून(द्वितीय), 2018



भूल सुधार


नीना छिब्बर


शर्मा जी अपने एरिया के प्रमुख थे,उन्हें प्रतिदिन इस बात का लेखा जोखा रखना पडता था कि किस एरिया मे कितने आक्सीजन सिलेंडरो का वितरण कब,कहाँ,कैसे करना है।आज भी रोज की तरह एक हाथ मे चाय का कप,दूसरे मे कलम लेकर काम कर रहे थे।अचानक दरवाजे पर धडाधड की ध्वनि हुई।शर्मा जी बौखलाए कौन मूर्ख है जिसे घंटी नही दिख रही। अ़दर से चिल्लाए , भ ई दरवाजा खुला है आ जाओ पर कोई उत्तर नही,आवाजें और तेज। गुस्से से बाहर आए तो दृश्य देखकर पैरों तले की जमीन खिसक गई।

सामने एक पीपल का पेड़ खडा था।हाथ जोड कर बोला कृपया मुझे प्रतिदिन दो आक्सीजन सिलेंडर दे सकते हैं क्या?शर्मा जी ने अपने आप को चूयँटी काटी ,जो वृक्ष स्वयं चौबीसों घंटे सब जीवों को आक्सीजन देता है वह माँग रहा है। पेड ने कहा मैं आक्सीजन देता हूँ ,नहीं पहले देता था क्योंकि लोगों ने मुझे इस काबिल भी नही छोडा। मैं अपने साथ सबूत लाया हूँ।

पीपल के शाखा रूपी हाथों पर सूखे फूलों की मालाऐ, अगरबत्ती की डंडिया, अधजली रूई की बतियाँ, टूटे दीपक, फटे कैलेंडर, पुरानी ईश्वर की मूर्तियां, बचा खुचा प्रसाद था।सबसे अजीब सी गंध आ रही थी।शर्मा जी की नजरे झुक गई। पीपल बोला ,दिवाली से पहले तो मैं कचरा पात्र से बदतर बन जाता हूँ।

मेरे चबूतरे पर इतना प्लास्टिक का सामान है कि साँस लेना दूभर हो गया है।

आज दाता याचक बन दरवाजे पर खडा है।शर्मा जी ने क्षमा माँगी और वचन दिया कि हम सब इस भूल को सुधारेंगे। प्रकृति केअकूत आक्सीजन भंडार को एवं देवतुल्य पीपल को स्वच्छ रखेंगे। संपूर्ण मानवजाति की ओर से पुनः क्षमा याचना की।


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