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वर्ष: 2, अंक 39, जून(द्वितीय), 2018



तलाक का तोहफा


नज़्म सुभाष


"तो क्या सोचा राजीव"

" अब सोचने जैसा कोई विकल्प बचा ही कहां है बस जल्दी ही हम तलाक की अर्जी दे देंगे"

इतनी आसानी से बोल दिया..." तलाक" ... यही एक शब्द था जो रश्मि के हृदय में धंसता चला गया ।

"मायरा और रेहान के बारे में कुछ सोचा है ?"

"उन्हें तो तुम ही रखना चाहोगी ...यदि मन न हो तो मुझे ही दे देना"

" मतलब हमारे बच्चे भी अब बोझ सरीखे हैं ।"

"नहीं... ऐसा मैंने कब कहा "

"बातों से तो ऐसा ही लग रहा है"

" मैं हर महीने बीस हजार दे दूंगा..।"

" अहसान रहेगा राजीव।"

" इसमे....इसमे अहसान की क्या बात है रश्मि ?...यह तो मेरा फर्ज है।"

" फर्ज " उसने आश्चर्य से राजीव को देखा और मुस्कुराते हुए आगे जोड़ा-"कमाल है राजीव तुम्हें पता है फर्ज।"

"तुम कहना क्या चाहती हो रश्मि"

" मेरे लिए भी कोई फर्ज है या...."

"निभाने की कोशिश तो करता था.....मगर अब नहीं"

"सात जन्मों का वादा था.....और एक जन्म भी..."

"ये सब पुरानी बातें हैं ।"

"हमारा रिश्ता भी तो नया नहीं"

"तुम बहुत ही दकियानूसी हो...ये पहले से कहाँ पता था."

दकियानूसी शब्द सुनकर वो बहुत जोर से हंसी।

" राजीव ....पता तो मुझे भी नहीं था कि हर रात शराब पीकर बिस्तर पर अलग अलग जिस्म...."

" रश्मिssssss" राजीव चीख उठा।रश्मि आज अपनी ही रौ मे थी

" वैसे अगर तुम्हे पता चले कि कभी-कभी मेरा भी मन किसी गैर की बाहों के लिए मचलता है"

"तू तो है ही रंडी ।"

"और तुम ......तुम क्या हो?"

" मैं मर्द हूं मर्द "। राजीव ने सीना ठोका...जैसे चुनौती दे रहा हो

" हाहाहा मर्द....मतलब सुअर।"

" कमीनी गाली देती है ..." राजीव ने हाथ उठाया ही था कि वह चीख उठी।

"न न राजीव.....अब ये गल्ती मत दोहराना.....मेरी कलाई देखो...अब चूडियां नही पहनती में....।"

राजीव का हाथ जहाँ था वहीं रुक गया ।मारे गुस्से और क्षोभ के वो थरथर कांप रहा था..उसने आग्नेय नज़रों से रश्मि को देखा और चीख पड़ा-"तुम अभी की अभी मेरे घर से दफा हो जाओ ।"

"अच्छा..ये घर तुम्हारे बाप का है क्या...?.मेरे नाम है घर"

" पैसा तो सारा मेरा लगा है "

"ठीक है फिर साबित करना कोर्ट में"

"तुम चाहती क्या हो?"

"यही कि जगह-जगह मुंह मारने वाले सुअर मुझे अपने घर मे पसंद नहीं।" रश्मि चट्टान की तरह दृढ़ थी।

ऊंची आवाज सुनकर बच्चे जग गए थे और इस वक्त भकुआये से कभी रश्मि को देखते तो कभी राजीव को...

राजीव हक्का बक्का रश्मि को देखता रहा....इतना बड़ा निर्णय.....उसने बैग उठाया और घर के बाहर आने लगा।

" सुनो"

पीछे से आवाज आई ।उसने मुड़ कर देखा।

" मैंने तुम्हारी फर्ज अदायगी के बीस हजार रुपये माफ किये ।मेरी तरफ से हर महीने तलाक का तोहफा खरीदते रहिएगा....और हां..मुझे याद जरूर करना।"

राजीव रश्मि को देखता रहा ।कल तक उसकी एक डांट पर थरथर कांपने वाली रश्मि...... आश्चर्य .....मगर बाजी हाथ से निकल चुकी थी वह मुड़ा और बोझिल कदमों से आगे बढ़ गया।


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