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वर्ष: 2, अंक 39, जून(द्वितीय), 2018



नमक का घोल


नज़्म सुभाष


ढाबे पर बैठे-बैठे खामोशी बहुत लंबी हो चली थी। अब ऊब भरी उकताहट न पसर जाये लिहाजा जिज्ञासा ने बोलना ही उचित समझा ।

"तो.. अगले हफ्ते मैं दिल्ली जा रही हूं"

प्रशांत वैसे ही जड़वत बैठा रहा। जैसे कुछ सुना ही नहीं।

" मैं कुछ कह रही हूं "

"सुना .... मगर रोक भी तो नहीं सकता"

" फिर ठीक है... मुझे लगा शायद यहां पर होकर भी नहीं हो"

"हां, मैं सोच रहा था मुझे क्या करना चाहिए?"

" मेरी मानो तुम भी दिल्ली निकल चलो ।वैसे भी गांव में धूल, मिट्टी,उकताहट के सिवाय है क्या?"

"बेरोजगारी भी..."उसने जोड़ा

"हां वो तो है ही..."

"अब ठीक है... मगर मैं अभी नहीं जा रहा"

" खैर चलते तो हफ्ते दो हफ्ते में मिलना ही हो जाता" कहकर वो मुस्कुराई।

प्रशांत ने जिज्ञासा की आंखों में देखा शायद कोई भाव पकड़ में आ जाये मगर वहां कुछ भी ऐसा न था जिसपर ठहरकर सोचा जाये।"

" क्या देख रहे हो ?"

"यही कि वक्त कितनी जल्दी बदल जाता है "

"तुम रोकना भी तो नही चाहते।"

"वक्त हमारे घर का मेहमान होता तो शायद....... खैर चाय पियोगी?"

उसने जेब टटोली ।मात्र पांच रुपये....

"छोटू जरा एक चाय देना "

उसने लड़के को आवाज दी।

"जी लाया ।"

"एक चाय...?.तुम नहीं पियोगे क्या ?"

"नहीं"

"पैसे मैं दे दूंगी।"

" ऐसी बात नहीं है"

छोटू चाय लेकर आ गया ।

"सुन भाई ...ये गिलास यहां रख दे... और एक चम्मच नमक के साथ एक गिलास भी ले आ"

" नमक !"
छोटू ने उसे ऐसे देखा जैसे कोई अजूबी चीज मांग ली हो

" हां भाई काम है "

"ठीक है लाता हूं"

"तुम नमक क्या करोगे ?"वो हैरान थी।

उसने फिर से उसकी आंखों में झांका।यहाँ कुछ भी तो नहीं ....आखिर बार-बार क्या पढ़ना चाहता है वो? उसे खुद पर ही कोफ़्त हुई।

छोटू उसे एक पुड़िया में नमक और एक गिलास दे गया। उसने मेज पर रखे जग का पानी गिलास में उड़ेला। फिर नमक डालकर हिलाने लगा।

"क्या कर रहे हो ?" अव वो उकताने लगी थी।

उसका सारा ध्यान नमक को घोलने पर था। वो उसे बड़े गौर से देखती रही।

उसने गिलास होठों से लगाया और.... गट् गट् पी गया।
खों..खों..खों.sssss

नमक जैसे तेज़ाब की तरह अंदर उतरा था। उसकी आंखें पनीली हो गयीं।

" तुम पागल तो नहीं हो "
वो विस्मय से चीख उठी।

" नहीं "

"फिर...ये सब क्या है?"

"वक्त बदल रहा है जिज्ञासा..मैं भी देखना चाहता हूं मीठी चाय के आदी इंसान को नमक का घोल कैसा लगता है"

जिज्ञासा हतप्रभ सी उसके चेहरे को ताकती रही।बहुत कुछ था जो चेहरे पर चस्पा था।एक बेवश तस्वीर उसके दिल मे उतर गयी प्रशांत ने जेब टटोली ।पांच का सिक्का निकाला और ढाबे वाले को पकड़ा दिया ।

"चलता हूं अब....दिल्ली मुबारक हो तुम्हे।"

"अभी हफ्ते भर हूं..... हम मिल सकते हैं ।"

उसने जिज्ञासा के चेहरे को बड़े गौर से देखा।खोखली सी मुस्कुराहट होंठो पर तैर गयी.....। आंखों में नमी उतरने ही वाली थी.....वो झटके से मुड़ा और आगे बढ़ गया। जिज्ञासा के शब्द उसके कानों की पहुंच से बहुत दूर ही छूट गये थे।


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