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वर्ष: 2, अंक 39, जून(द्वितीय), 2018



हाइकु


नरेंद्र श्रीवास्तव


 
  (1)
   
आँखों के घड़े
अँसुअन से भरे
कंठ हैं प्यासे।

  (2)
       
भोर चली है
सिर पे घड़ा लिए
गाँव छोड़ के।

  (3)
       
तन भुतहा
रोटी-पानी के बिन
हाड़ न माँस।

  (4)
      
कथा के हिस्से
नदी,कुआं,झरने
आँसू सुनते।
       
  (5)

सूनी झोपड़ी
भरी दुपहरी में
आग-सी तपे।
 

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