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वर्ष: 2, अंक 39, जून(द्वितीय), 2018



आजकल तू इधर नही आती


योगेन्द्र कुमार निषाद


                                
आजकल तू इधर नही आती।
नौ बहारें ....नजर नही आती।

बाम पर चाँद है खड़ा रहता,
पर तु है की नज़र नही आती।

सोच थी जब मिलो तो कह देंगें,
वक्त पर लौट कर नही आती।

ख़्वाब आकर चला गया फिर भी,
नींद क्यों रात ....भर नही आती।

जिन्दगी ने कहा कही रूक,पर
जिन्दगी क्यो ठहर नही जाती।

मन करै पंख लगा उड़ुँ मै भी,
पर मुझे ये हुनर नही आती।

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