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वर्ष: 2, अंक 39, जून(द्वितीय), 2018



दादी माँ...


विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र'


                                
माँ  से  भी  अच्छी  भाती   दादी माँ
पिटने  से  मुझको  बचाती  दादी माँ

मैं  सलौना  था  बचपन में कहती वो
काजल-टीका  रोज  लगाती दादी माँ

जब आजाता कोई भिखारी घर अपने
अपने आँचल में मुझे छुपाती दादी माँ

छुप-छुप  करके  अपनी बहू से मुझको
लोणी  घी  भी  खूब  खिलाती दादी माँ

यूं  तो  थी  क़जूस  घर  में अब्बल जो
मेला  खर्ची  फिर  भी  देती  दादी  माँ

स्वर्ग  सिधारी  वो  व्यग्र  हूं  मैं  तबसे
याद  मुझको  बहुत  आती  दादी  माँ

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