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वर्ष: 2, अंक 39, जून(द्वितीय), 2018



दोहे


शुचि 'भवि'


                                    
1
धीरज धरना सीख तू,धीरज सुख का मूल। शूल मिटाकर राह के,धीरज देता फूल।।
2
रिश्तों की देखी बहुत,हमने जग की रीत। जगत स्वार्थी कौन है,यहाँ किसी का मीत।।
3
लम्बी बेशक रात है,रस्ता भी अंजान। लेकिन होनी है सुबह,ये भी निश्चित जान।।
4
सोते जब हम रात में,और न करते ध्यान। तब भी रखता ध्यान है,सबका ईश महान।।
5
दुहरापन कितना लिए,है इंसानी ख़ून। गिरगिट भी हैरान है,उसका देख जुनून।।
6
जीवित का आदर नहीं,पितृ पूजते आप। ऐसे ख़ुश क्या स्वर्ग में,होते हैं माँ-बाप।।
7
नारी दिखलाती नहीं,पुरुषों जैसा जोश। लेकिन उसमें कम नहीं,होता धीरज-होश।।
8
देवों से भी हैं अधिक,जग में देवी धाम। आएँगी करने मदद,सुमिरन करिए नाम।।
9
उसको पाने की हवस,मन में पापी आस। ऐसे में महिला-दिवस,लगता है बकवास।।
10
सागर से मोती चुने,होता कौन महान। अमृत बाँटे विष पिये,भवि वो है भगवान।।
11
बेटों की क्या कलियुगी,अजब-ग़ज़ब है बात। अय्याशी दिन रात की,माँ को सूखा भात।।
12
माँ के दम से सृष्टि है,दुनिया मेरे लाल। अपनी माँ को पूज तू,होगा मालामाल।।
13
समदर्शी बनकर सदा,शिक्षक देता ज्ञान। शिक्षा को जो बेचता,वो है बेईमान।।
14
सुबह-सवेरे जागिए,जो बनना हो नेक। आदर सबका कीजिए,'भवि' ये भी गुण एक।।
15
झाड़ू-पोछा कर लिया,घर तो तूने साफ़। दूषित मन 'भवि' वो करे,कैसे तुझको माफ़।।

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