Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 39, जून(द्वितीय), 2018



पर्यावरण का विस्तार


डॉ.प्रमोद सोनवानी पुष्प


                               
बंदर - भालू , बाघ - भेड़िये ,
रहते हैं जी जंगल में ।
तोता - मैना , श्यामा - बुलबुल ,
खूब चहकते जंगल में ।।

वहाँ भरे हैं घास हरे ।
गाय - बकरीयाँ खूब चरे ।।

कंद - मूल , फल भरे पड़े ।
तरह - तरह के पेड़ खड़े ।।

अब इनको न छेड़ना है ।
बल्कि वृक्ष लगाना है ।।

काटें अब न एक भी पेड़ ।
कोई काटे तो उसे खदेड़ ।।

पर्यावरण का हो विस्तार ।
अब करना है उससे प्यार ।।
 

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें