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वर्ष: 1, अंक15, जून(द्वितीय), 2017



आँख नहीं लगती

राम कृष्ण खुराना


  

  पंजाबी में “आखना” शब्द का अर्थ होता है कहना ! इसके अनुसार जो कुछ भी ह्र्दय का भाव होता है उसे कह देने वाले को ‘आंख’ कहते हैं ! आंख को चख, नयन, लोचन, नेत्र, नज़र आदि कई नामों से पुकारा जाता है ! इसको चख कहने का भी एक कारण है

  अब मान लीजिए आपके सामने रसगुल्ले, गुलाब-जामुन, बर्फी, समोसे, पकौडे आदि-आदि रखे हुए हैं ! रसगुल्ले को देखते ही आपके मुंह में पानी आ जाता है ! आप चम्मच को उठाने में भी अपना समय गवाना नहीं चाहते ! अंगूठे और तर्जनी की सहायता से एक रसगुल्ला उठा कर, उसके रस से अपने कपडों को बचाते हुए, थोडा-सा आगे की ओर झुक कर, झट से पूरा का पूरा रसगुल्ला मुंह में गडप कर जाते हैं ! और मुंह को गोल-मटोल करके अपने चेहरे के लगभग 35-36 कोण बनाकर रसगुल्ला खाते हुए कह देते हैं-“यह तो बहुत ही मीठा है !”

  उसी प्रकार से समोसे आदि में भी नमक मिर्च की कम या अधिक मात्रा का ज्ञान आप उसे मुंह से चखकर कर सकते हैं ! परंतु यदि कोई सौंदर्य प्रतियोगिता हो रही हो और आपको सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी का चयन करने के लिए कह दिया जाय तो आप उसके सौन्दर्य का स्वाद मुंह से चखकर तो नहीं बता पायेंगें ! यदि ऐसा सम्भव होता तो लोग सौन्दर्य प्रतियोगितायों में चार-चार किलो के डालडा के खाली डिब्बे ले जाते और खुरजा के खुरचन की तरह अच्छे से अच्छा अपना मनपसन्द सौन्दर्य उसमें भर लाते और डिब्बा बन्द करके घर के एक कोने में रख देते ! बस, जब तबियत मचलती एक चम्मच निकालते और मुंह मे रख लेते ! परंतु सौन्दर्य का स्वाद मुंह से नहीं, आंख से ही चखा जा सकता है ! इसी कारण लोग इसे “चख” (चखने वाला) कहने लगे !

  नयन से तात्पर्य है “नय नहीं” अर्थात जिसमें ‘नय-नीति-न्याय’ न हो ! नयन में नीति नहीं होती ! यां यूं कह लीजिए कि आंख नीति से काम नहीं लेती ! जो कुछ भी गलत-सही यह सामने देखती है, आईने की तरह, साफ-साफ, वही झट से मस्तिष्क तक पहुंचा देती है ! चाहे उस समय दिल कितना ही दुखी क्यों न हो ! मस्तिष्क कितना ही अशांत क्यों न हो ! इसमें इतनी नीति नहीं होती कि अशांत व दुखी ह्रदय को कष्टकारक घटना बताकर उसे और परेशान न करे ! आंख की इसी आदत के कारण ही उसे लोग “नयन” या “नैन” कहने लगे !

  परंतु आप धोखे में मत रहिएगा ! ये नज़रें भी कई नज़ारे करती हैं ! इसके भिन्न-भिन्न पोज़ों के अर्थ भी भिन्न ही होते हैं ! आप स्वंय ही देख लीजिए –

  “नज़र उठे तो कज़ा होती है,
  नज़र झुके तो हया होती है !
  नज़र तिरछी हो तो अदा होती है,
  नज़र सीधी हो तो फिदा होती है !”


  मैंने कई लोगों से यह प्रश्न किया कि यदि आंखें न होती तो क्या होता ? सबका एक ही रटा-रटाया उत्तर मिला कि यदि हमारी आंखें न होतीं तो हम अन्धे हो जाते, हमें कुछ दिखाई न देता, हम चल-फिर नही सकते थे ! आदि-आदि ! लेकिन मैं इस उत्तर से संतुष्ट नहीं ! इस संसार में कई लोग प्रज्ञाचक्षु हैं तथा अच्छे- अच्छे पदों पर आसीन हैं बिना किसी हिचकिचाहट के हाट-बज़ार हो आते हैं ! तथा आंख वालों से अच्छे हैं ! लेकिन जनाब मैं आपको एक राज़ की बात बता दूं ? सच मानिए, यदि नज़रें न होती तो सबसे अधिक नुकसान औरतों का होता ! विशेषकर सुन्दर औरतों का ! आपने नही सुना –

  “यह नज़रें न होती तो नज़ारा भी न होता !
  तब इस दुनिया में हसीनों का गुज़ारा भी न होता !!”


  यह नयन केवल देखने-पढने के काम ही नहीं आते ! लेने वालों ने तो चुपके से इनसे कई काम ले लिए और आपको पता भी नहीं चला ! “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी” को चरितार्थ करते हुए अपनी-अपनी भावनानुसार लोगों ने इनका कई कामों में प्रयोग किया है !

  आधुनिक युग में गगनचुम्बी इमारतों को बनाने के लिए उससे दुगनी-तिगुनी ऊंचाईं के नोटों के ढेर लगाने पडते हैं ! तिस पर हालत यह है कि किराए पर एक कमरा तक नही मिलता ! परंतु कदाचित आपका परिचय कबीर दास जी से नही हुआ होगा ! उनके कथनानुसार आपको इतनी मंहगी सीमेंट और ईंट लेने की आवश्यकता नहीं ! लोहे-सरिए के झंझट में पडने की जरूरत नहीं ! उन्होंने आंखों से बिना “लिंटल’ की कोठरी तैयार कर दी ! इतना ही नहीं उसमें फर्नीच्रर भी फिट कर दिया ! कबीर दास जी कहते हैं –

  “नैनों की कर कोठरी, पुतली पलंग बिछाय,
  पलकों की चिक डारि के, पिय को लिया रिझाय !”


  परंतु यह आंखे बहुत चंचल हैं ! कई बार इनके बोये हुए कांटों से दिल लहुलुहान हो जाता है ! गुनाह यह करती हैं, सज़ा दिल को मिलती है –

  तपन सूरज में होती है,
  तपना ज़मीं को पडता है !
  मुहब्बत आंखों से होती है,
  तडपना दिल को पडता है !!


  लेकिन उस पर तुर्रा यह है कि निगाहें अपना कसूर मानने को तैयार नहीं ! वे अपना पक्ष प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि –

  “फिर न कीजै मेरी गुस्ताख निगाहों का गिला !
  देखिए आपने फिर प्यार से देखा मुझको !!”


  इसका तात्पर्य यह नही है कि आंख पर इस तपन का कोई असर ही न पडता हो ! जिस् प्रकार से दूध में पानी मिलकर दूध के भाव बिक जाता है, परंतु जब दूध को गर्म करते हैं तो सबसे पहले पानी ही जल कर भाप बनता है ! उसी प्रकार से दिल के तडपने की आंच आंख पर भी पंहुचती है ! तभी लोगो को कहते सुना है “जब से आंख से आंख लगी है, आंख नही लगती !”

  दशा यह होती है कि कई-कई रातें आंखों ही आंखों मे कट जाती हैं ! ह्रदय प्रेम के हिंडोले में झूलने लगता है ! तब आंख व दिल दोनों एक-दूसरे से शिकायत करने लगते है ! मीर साहब ने कहा है –

  “कहता है दिल कि आंख ने मुखको किया खराब,
  कहती है आंख कि मुझे दिल ने खो दिया !
  लगता नहीं पता कि सही कौन सी बात है,
  दोनो ने मिल के “मीर” हमें तो डुबो दिया !!”

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