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वर्ष: 1, अंक15, जून(द्वितीय), 2017



बिमली

राजेन्द्र वर्मा


  

  - कल क्यों नहीं आयी बिमली?

  - कल मेहमान आ गये थे बीबीजी! मेरे को देखने....अचानक.....।

  - अच्छा, कुछ बात बनी?

  - कहाँ, बीबीजी! यह तो वही मसल हो गयी कि घर में नहीं दाने/अम्मा चलीं भुनाने!

  - मतलब?

  - अरे मतलब साफ है- दहेज के लिए रोकड़ा नहीं, तो लड़की काली है, क़द छोटा है, दूसरों के घर काम करती है।.... अरे सब बहाने हैं, बहाने बीबीजी! मोटरसाइकिल और टी.वी. चाहिए। इकी खातिर सत्तर हज़ार कहाँ से लायें? फिर खाना-पीना और सजावट-वजावट की खातिर चालीस-पचास अलग से ! इत्ता पैसा कहाँ से लाएँ ?

  - क्यों, क्या कोई और नहीं कमाता घर में? और कौन-कौन हैं घर में?

  - सभी कमाते हैं- अम्मा, बाबू। भैया अभी पढ़ता है। लेकिन हम तीनों मिलकर बीस दस-बारह हज़ार ही कमा पाते हैं। खर्चा ही नहीं पड़ता, बचायें कहाँ से ? कितनी भी कंजूसी करें, पेट काटें, तब कहीं हज़ार रुपये बच पाते हैं!...इत्ते में हम कितना दहेज जुटा सकते हैं?

   बिमली के चेहर पर विवशता की रेखाएँ उभर आयीं ।.....यही हाल तो उनका अपना था। मियां को तो बीस हज़ार रुपये कट-पिट कर मिलते थे। मुश्किल से खर्च निपटता था,बचत की कौन कहे? त्योहार आये या कहीं आना-जाना हो, तो और मुसीबत! आये दिन चार-छह हज़ार का क़र्ज़ चढ़ जाता है!

   फिर भी शादी तय होने पर बिमली को उन्होंने दस हज़ार देने का वादा कर लिया।

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