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वर्ष: 1, अंक15, जून(द्वितीय), 2017



भविष्य-निधि

राजेन्द्र वर्मा


   श्यामाचरण बाबू ने भविष्य-निधि से पचीस हजार रुपये निकालने के लिए प्रार्थनापत्र दिया। अधिकारी ने उसकी जाँच की। धन की आवश्यकता के कालम में उन्होंने ‘स्वरचित पुस्तक का प्रकाशन’ लिखा था। अधिकारी ने उन्हें समझाया-

  “इससे पहले भी आप काफ़ी रक़म पी.एफ्. से निकाल चुके हैं : पुत्री का विवाह, मकान की मरम्मत, लम्बी बीमारी का उपचार! अब इस फ़ालतू काम के लिए !’’

   ‘‘लेकिन, सर! कोई प्रकाशक भी तो तैयार नहीं होता।’’

   ‘‘तो मत छपवाओ!...देखो, मैं तुम्हारे भले के लिए ही कह रहा हूं। कल तुम्हें पैसों की ज़रूरत पड़ेगी, तब, तुम्हारी मदद कौन करेगा? अपना भविष्य क्यों बरबाद कर रहे हो?’’

  ‘‘सर! भविष्य की बेहतरी के लिए ही तो पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहता हूं। इसमें मेरे जीवन-अनुभव का सार है, मेरी साधना है। इसे मैं वर्तमान के सम्मुख रखना चाहता हूँ ताकि उज्ज्वल भविष्य का निर्माण हो!...सर! भविष्य-निधि तो भविष्य-निर्माण के लिए ही तो होती है।....यदि साहित्य से ही भविष्य का निर्माण न होगा, तो किससे होगा?’’

  ‘‘चलिए, एक मिनट के लिए आपकी बात मान लेते हैं, परन्तु श्याम बाबू! भविष्य-निधि से प्रकाशन के लिए धन के आहरण का प्रावधान कहां है?....अच्छा, आपने पुस्तक-प्रकाशन की अनुमति ली है?’’

  ‘‘ली तो नहीं सर! लेकिन क्या वह हमारी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता में शामिल नहीं है? यह तो हमारे मूल अधिकारों में से एक है!’’

   ‘‘कुछ भी हो, पर इसके लिए आपको आहरण की अनुमति नहीं मिलेगी!’’

   श्यामाचरण ने कुछ सोचते हुए प्रार्थना-पत्र वापस ले लिया । अगले दिन उन्होंने विवाह की पच्चीसवीं वर्षगाँठ मनाने के लिए प्रार्थना-पत्र दिया।... अधिकारी ने मुस्कुराते हुए उसे स्वीकृत कर दिया।

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