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वर्ष: 1, अंक15, जून(द्वितीय), 2017



कामिनी कामायनी

विद्रोही


  वह उस समय के बंबई के किसी मेडिकल कालेज अस्पताल के छात्रावास मे रहता था। नेपाली नागरिक । शांत ,सौम्य ,और दृढ़ निश्चय। बंबई की चमक दमक वाली जिंदगी में भी उसकी अलग पहचान थी । उसकी चारित्रिक निष्ठा भले ही वहाँ उपहास का कारण रहा हो ,मगर लोगबाग उसकी इज्जत करते थे ,उससे डरते भी थे । ऐसा कहा गया था कि एक बार एक आधुनिका मुसकुराती हुई उसके कमरे में प्रवेश कर गई थी । सहपाठिनी ही थी ।पवनपुत्र हनुमान भक्त ने उसे ऐसा चांटा मारा कि बेचारी के होश फाख्ता हो गए ,प्यार का खुमार जाता रहा था । एमडी करने के बाद वह वहाँ से वापस अपने देश लौट गया था । क्रांतिकारी तो था ही ,राजतंत्र का विरोधी भी ,माता पिता ने लाख कोशिश की शादी कर ले मगर उसने हाँ नहीं की। उसने अपना क्लीनिक खोल लिया था । अचानक एक दिन वह गायब हो गया था ।कलेजे पर मुक्का मार मार कर परिजन जीवित कहलाने की कोशिश कर रहे थे । महिना बीता,साल बीता ,दो ,तीन ,कई साल बीत गए थे । एक दिन एमनेस्टी इन्टरनेशनल द्वारा नेपाल के कुछ राजनीतिक कैदियों का दर्दनामा छापा गया । साथ में कई फोटो भी प्रकाशित हुई । लोगों ने देखा ,बिखरे बाल,आँखों पर चश्मा ,हाथ में हथकड़ी , मुसकुराते हुए डाक्टर का फोटो । फिर कुछ भी ,कभी भी नहीं पता चल सका था ।

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