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वर्ष: 1, अंक15, जून(द्वितीय), 2017



कामिनी कामायनी

भ्रम


  पैरों ने अपनी गति तेज कर दिए थे । ध्वनि बढ़ गई थी । कान ने कान लगाए , आहट बड़ी तेजी से करीब चली आ रही थी ।कान ने अपनी शक्ति केन्द्रित कर लिया । पैर कुछ पल के लिए रुक गए । कान ने अपने कान पर फिर ज़ोर लगाया । आहट थम गई थी ,एकदम शांत । कुछ पल के लिए विचलित सा होता हुआ वह रुका । यह भाँप पैरों में प्रकंपन हुआ ।उसे लगा ,कान उसकी सुधि लेना चाहता है ,वह मुखरित होकर गतिशील हो उठा । तीव्र !तीव्र ! तीव्र! दूर दूर तक उसके पदचाप सुनाई देने लगे । कान कुछ हर्षित हुआ । वह ठिठका रहा । मगर न जाने पैर को क्या याद आ गए । वह चौकन्न होकर चलने लगा । कुछ देर तो उसकी आवाज आती रही ,मगर फिर बंद हो गई । सन्नाटे से कान बुरी तरह घबड़ा गया । सोचा , कहीं थक कर बीच में ही तो नहीं रुक गया उसके इंतजार में । देखूँ हाल क्या है । वह मुड़ा ,उसने देखा ,दूर बहुत दूर ,धीरे धीरे ,सुस्ताए कदमों से पाँव विपरीत दिशा में चला जा रहा था ।

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