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वर्ष: 1, अंक15, जून(द्वितीय), 2017



लौटा दो सावन

जनकदेव जनक


   ‘चांदनी !’

  ‘हूं.’

  ‘श्रीनगर चलोगी, हम जम्मू कश्मीर की खूबसूरत वादियों में स्वच्छंद विचरण करेंगे. आकाश ने यूंही उससे पूछ लिया.

  ‘सच,तुम मुझे धरती का स्वर्ग दिखाओगे? तब तो ब़ड़ा मजा आएगा. गांव की लड़की के लिए जम्मू कश्मीर तो एक सपना जैसा होता है. ’ चांदनी ने मारे खुशी के आकाश को अपने आगोश में भर लिया.

  ‘हा-हां क्यों नहीं, इसलिए तो पूछ रहा हूं. जब सियाचिन ग्लेसियर में तैनात रहता हूं. वहां तुम्हारी बहुत याद आती है. ख्यालों में तुम से बातें कर तुम्हारे देह की गर्मी व गंध को महसूस करता हूं.’ यकायाक आकाश चांदनी को उतसुक देख कर भवावेश में उससे चुहलबाजी की.

  ‘देखो, एक तरफ पाकिस्तान और दूसरी तरफ चीन सरहद पर सीनाजोरी करते रहते हैं. वैसी विषम परिस्थिति में भला मेरी याद तुम्हें कैसे आयेगी. मुझे झूठ मूठ खुश करने के लिए तारीफों का पुल न बांधो. कही ऐसा न हो कि उम्मीद की किरण जगा कर चुप चाप निकल जाओ. ’ चांदनी ने उसे उलाहना दिया.

  ‘ फिजुल बातें न सोचो, तुम मेरी जीने की चाहत हो. मेरी जिंदगी की खास मकशद हो. जब तक तुम मेरे दिल में रहोगी. सरहद पर दुश्मन मेरा बाल भी बांका नहीं कर सकता. ’

  ‘ आकाश, तुम कितने महान हो. तुम्हारी इसी जिंदा दिल्ली पर मेरा तन और मन कुर्बान है. ’ इतना बोलते बोलते चांदनी का मन भावुक हो उठा. वह खिड़की से बाहर आसमान की ओर देखने लगी.आंखों में आये अपनी आंसुओं को उसने झट अपनी आंचल की कोर से पोछ लिया.

   चांदनी को अधीर देख कर यकायक आकाश भी स्तब्ध रह गया. उसने जम्मू कश्मीर का प्रसंग बदलने के ख्याल से उससे पूछा,

  ‘ नभ में क्या देख रही हो?’

  ‘ चांद को दे्ख रही हूं, जो खिड़की से अंदर झांक रहा है. ’

  ‘जानती हो क्यों झांक रहा है?’

  ‘नहीं!’

  ‘मैंने उसकी चांदनी को कैद कर जो रखा है.’ इतना कह कर आकाश उसे अपने आलिंंगनपाश में जकड़ लिया. दोनों एक दूसरे की बाहों में समाये पलंग पर निढाल होकर पसर गये. नि:शब्द, चुपचाप. दिल की धड़कनों से आत्मसात करते रहे.

   छुट्टी खत्म होने के बाद आकाश चांदनी को लेकर श्रीनगर के लिए प्रस्थान किया. रेलवे स्टेशन पर दोनों को छोड़ने के लिए आकाश की मां गायत्री देवी और पिता सरपंच घनश्याम प्रसाद पहुंचे थे. उनका स्नेह व प्यार पाकर चांदनी को ऐसा लगा जैसे अपने मायके से ससुराल जा रही हो. खुलने से पूर्व ट्रेन ने सीटी बजाई तो चांदनी का कलेजा धक धक करने लगा. अपने सास ससुर से बिछुड़ना उसे अच्छा नहीं लग रहा था. जब ट्रेन पटरी पर रेंगने लगी तो उसका मन अधीर हो उठा. खिड़की से बाहर हाथ निकालकर हाथ हिलाने लगी.उनसे अलग होते उसकी आंखें अचानक बरस पड़ीं.

   ‘ देखना आकाश बेटे, हमारी बिटिया रानी को किसी तरह की तकलीफ न हो. श्रीनगर पहुंचने के बाद जरूर फोन करना. ’ ट्रेन से पीछे छुटती गायत्री देवी ने उसे चेतावनी के लहजे में कहा.

   श्रीनगर पहुंचने के बाद आकाश अपने दैनिक दिनचर्या में लग गया. लेकिन जब भी उसे फुर्सत मिलती, चांदनी को साथ लिए जम्मू कश्मीर की सैर कराता. चांदनी का साथ पाकर वह काफी खुश था. हमेशा उसकी इच्छाओं का सम्मान करता था. उसे अहसास नहीं होने देता था कि गांव छोड़ कर शहर में आई है. अक्सर शाम को वे किसी न किसी पार्टी में शामिल होते. वह अपने मित्र विंग कमांडर सरदार तेजपाल सिंह, लांस नायक अरबाज खान, उसकी बीवी नर्गिस बेगम, लफ्टिनेंट विजय अरोड़ा और उसकी पत्नी विजया लक्ष्मी आदि से मिलवा चुका था. हालांकि नई जगह और नये वातावरण में चांदनी की स्वतंत्रता खत्म हो गई थी. वह बिना आकाश के एक कदम भी कहीं आ जा नहीं सकती थी. अनजान लोगों के बीच उसे घुटन सी महसूस होती. खुलकर किसी मुद्दे पर बात भी नहीं कर पाती थी. पार्टियों में सब तरह के व्यंजनों के साथ मदिरा का इंतजाम रहता था. वहां खाने पीने में उसे अटपटा लगता था. ऐसे में उसका मन कहता ,कहां आकर फंस गये!

   उसे बचपन से मांस और मदिरा के नाम से चिढ़ थी. उसकी गंध से उसे भी नफरत थी. संयोग से उसके ससुराल में भी ये चीजें वर्जित थीं. लेकिन श्रीनगर में तो ये चीजें अतिआवश्यक थीं. आकाश उन चीजों का सेवन करता और चांदनी को भी कराता था.

   अक्सर, आकाश उसे समझाता कि ठंड से बचने के लिए मांस और शराब जरूरी है. थोड़ा थोड़ा लिया करो, धीरे धीरे आदत पड़ जायेगी. आकाश के आग्रह को कभी उसने नकारा नहीं. थोड़ा थोड़ा लेना शुरू किया. पहले तो उसे उल्टी होने लगती थी. मांस - मदिरा को छूते उसका जी मिचलने लगता था. लेकिन दैनिक जीवन में डेली उपयोग से सब कुछ बदल गया. अब उसे किसी के साथ जाम टकराने में शर्मिंदगी महसूस नहीं होती थी. आकाश नहीं भी रहता तो अकेला पार्टी अटेंड कर लेती थी या फिर विंग कमांडर तेजपाल सिंह को बुला लेती थी. अब पार्टिंयों में अनजाने लोग बेगाने नहीं लगते थे. लगता था कि वह उन्हें पहले से जानती है. अब पार्टी में खुल कर एंज्वॉय करती. कभी कभी तो इतना पी लेती थी कि घर लौटना भी मुश्किल हो जाता था. तब तेजपाल सिंह उसे घर पहुंचाता.

   सरदार तेजपाल सिंह सियाचिन में तैनात सैनिकों के लिए खाना रशद सामग्री आदि पहुंचाने का काम करता था. साथ ही उसके कार्यों में बीमार सैनिकों को अस्पताल तक पहुंचाना भी शामिल था. चांदनी का पति मेजर आकाश और तेजपाल सिंह अच्छे मित्र थे. जब मेजर को काम से छुट्टी नहीं मिलती तो अक्सर तेजपाल सिंह ही चांदनी को जहां तहां घुमा देता था.

   आकाश भी उसके प्रति काफी लापरवाह हो गया था. पहले जैसा वक्त अब चांदनी को नहीं दे पाता था. उसका लाभ चांदनी ने उठाना शुरू कर दिया था. जब भी समय मिलता तेजपाल सिंह को फोन कर बुला लेती थी.उसके साथ पर्यटन स्थलों का भ्रमण करने निकल जाती. शुरू शुरू में उसने वैष्णव देवी और अमरनाथ का दर्शन किया. उसके बाद पहलगाम,गुलमर्ग,सोनमर्ग आदि स्थलों घुम घुम कर देखा, जम्मू कश्मीर की घाटियों में घुमना उसे अच्छा लगता था. वह सेब ,नाशपाती, आड़ू, बादाम, अखरोट,अंगूर आदि बागों में विचरण करने पहुंच जाती. वहां काम करने वाली कश्मीरी,डोगरी ,पंजाबी, उर्दू और लद्दाखी भाषा भाषी पुरूष-महिलाओं से बातें करती. उनकी बहुत सारी बातें उसे समझ में नहीं आती. फिर भी उनके चेहरे का हाव-भाव और भाव -भंगिमा से बातचीत का आशय समझ लेती थी.

   अक्सर आकाश जब भी सोसल साइट को खोलता. किसी न किसी पर्यटन स्थल पर चांदनी के साथ तेजपाल की तस्वीर साथ होती. पता नहीं क्यों उसके मन में उन तस्वीरों को देखने के बाद जलन सी महसूस होने लगी थी. वह मन ही मन पश्चताप करता कि क्यों चांदनी को घुमाने का जिम्मा तेजपाल सिंह को दिया. इन दृश्यों को देख देख कर उसका मन उदास रहने लगा था. धीरे धीरे आकाश के मन में चांदनी के प्रति बेवफाई की चुभन महसूस होने लगी थी.उसके मन में आशंका होने लगी कि कहीं दोनों के बीच गुपचुप प्रेम का अंकुर तो नहीं फूट रहा है.

   अचानक एक और तस्वीर सोसल साइट पर दीखी. चांदनी के छरहरे बदन पर डक गाउन जैकेट था, उसके सिंर पर लाल रंग का स्कार्फ और गोल्डेन फ्रेम में हल्के गुलाबी कलर का ग्लास वाला चश्मा उसकी खूबसूरत आंखों पर मनोहारी लग रहा था. उस वक्त चांदनी किसी गुड़िया से कम नहीं लग रही थी. वह अपने वास्तविक उम्र से भी कमसीन और कुछ ज्यादा ही हसीन लग रही थी. पास में खड़ा तेजपाल उसे एक लाल गुलाब प्रजेंट कर रहा था. यह देख यकायक आकाश के ऊपर बज्रपात हो गया. उसने मन ही मन फैसला कर लिया कि दोनों पर लगाम लगाना होगा. कहीं पानी सिर से ऊपर न बह जाये.

   मेजर से प्रोन्नत होकर आकाश मेजर जेनरल बन गया था. इस सुखद समाचार से उसका मन प्रफुल्लित था. वह चहता था कि इसकी सूचना वह चांदनी को फोन पर न देकर घर में जाकर दे. वह जल्द से जल्द चांदनी से मिलने के लिए बेकरार था.

   इधर एक सप्ताह से तेजपाल सिंह छुट्टी पर था. अपने गांव गया हुआ था. चांदनी को मालूम हुआ कि शादी की पहली सालगिरह पर अपनी पत्नी को खुश करने गया है. तब वह सोचने लगी कि एक उसका पति है, जिसे काम से फुर्सत नहीं मिलती. उसने कभी पत्नी की भावनाओं और इच्छाओं को नहीं जाना. उसने अपना पहला शादी का सालगिरह आंसुओं में नहा कर मनाया था. फूलों से सजी सेज सूनी रह गयी थी. वह सारी रात पति का राह निहारती रह गयी थी. छुट्टी नहीं मिलने का बहाना बनाकर आकाश घर नहीं पहुंच सका था. बीती बातें फिर से ताजा हो गई थीं. वह सोचने लगी एक सतपाल सिंह है जो पत्नी की भावनाओं का कद्र करता है. एक उसका पति है जो अपने गुरुर में पत्नी को कुछ समझता ही नहीं. चांदनी का दिमाग यूंही खराब हो रहा था. तभी दरवाजे पर बूंटों की आवाज सुनाई पड़ी. एक तो पहले से शराब का सेवन किया था ही, दरवाजा खोलने से पूर्व भी दो चार घूंट पी लिया.

  दरवाजा खुलते ही हवा के झौके के साथ आकाश अंदर घुसा और चांदनी को अपनी बांहों में उठा कर नाचने लगा. नाचते हुए उससे बोला कि मेरा प्रमोशन हो गया है चांदनी प्रमोशन, आकाश अब मेजर से मेजर जनरल बन गया है. उसने खुशी में पागल चांदनी के गालों व होंठों पर कई चुंबन जड़ दिया.

   आकाश का स्पर्श पाकर भी चांदनी के शरीर में न कोई स्पंदन न ही रोमांच हुआ. वह किसी निस्प्राण जीव की तरह आकाश की बाहों में पड़ी हुई थी. आकाश की तरक्की से उसे किसी तरह की खुशी नहीं हुई. उलटा उसका स्पर्श पाकर चांदनी का तन बदन जल रहा था. वह प्रतिशोध की आग में जल रही थी. अचानक विद्युत गति के साथ आकाश की बाहों से छिटकर बाहर हो गई. नफरत भरे लहजे में यकायक बोल उठी,

  ‘ मुझे छुना नहीं, ...अब तुम से नफरत सी हो गयी है..... ’

  ‘ चांदनी , अचानक तुम्हें क्या हो गया है. होश में तो हो?’ यकायक आकाश बीच में ही बोल पड़ा.

  ‘हा-हां, मैं होश में हूं..., बेहोश नहीं. ..’ चांदनी नशे में बके जा रही थी.

  ‘लगता है चांदनी , तुम बिल्कुल होश में नहीं हो. मैं सोचा था कि अपनी तरक्की की खबर तुम्हें सुनाऊंगा तो खुश होगी. मेरे साथ नाचोगी, खुशी मनाओगी. मुझे ढेरों सारा प्यार दोगी. लेकिन पता नहीं तुम्हें क्या हो गया है?’ उसने शांत भाव से चांदनी को समझाना चाहा.

  ‘ किसे प्यार देगी चांदनी..., पार्टिंयों में मेमिनों की जूतियां चाटने वाले की...उनके गले में बाहें डालकर नाचने वाले की...,जो मुझे भोग की वस्तु समझता है....अब भूल जाओ आकाश ...चांदनी को...’

   ‘ बंद करो बकबास, तुम्हारी बातों को सुनकर मैं खुद पागल हो जाऊंगा. कभी तुम्हें भोग की वस्तु नहीं समझा. ऐसा घिनौना आरोप तुमने मुझ पर कैसे मढ़ दिया?’ आहत होकर आकाश ने उसे समझाने का प्रयास किया.

  ‘सच कहा तो घिनौना हो गया...अब मैं तुम्हारे साथ एक पल भी नहीं रह सकती.... तुमने मेरे साथ बहुत अन्याय कर लिया....अब और बर्दास्त नहीं करूंगी. ’ नागिन की तरह फुफकारती हुई वह बोली.

   ‘यू शटअप चांदनी, एक लफ्ज भी आगे निकाली तो गर्दन मड़ोड़ कर रख दूंगा. ’यकायक आकाश का गुस्सा बेकाबू हो गया.

  ‘तुम मुझे मारोगे....मार कर तो देखो...तेरा मुंह नोंच लूंगी....’ चांदनी आंखें तड़ेरते हुए टेबल पर रखा शराब की बोतल को आकाश के ऊपर फेंक मारा. जिससे आकाश का सिर फट गया. वह ठीक से संभल भी नहीं पाया था कि चांदनी ने घर के अन्य सामानों को उठा उठा कर उसके देह पर फेंकना शुरू कर दिया. पल भर में सारा कमरा वर्तनों, कांच के टुकड़ों व अन्य चीजों से भर गया. यकायक आकाश अपने स्थान से जंप किया और चांदनी के पीछे पहुंचा. दो चार थप्पड़ जड़ते हुए उसे पलंग पर ढकेल दिया. नशे में चूर चांदनी औंधे मुंह गिरी तो फिर उठ नहीं सकी. आकाश दरवाजे को सटा कर बाहर निकल गया. उस घटना के बाद आकाश घर तथा चांदनी से दूर ही रहा. इतना दुख तो उसे कभी युद्ध के दौरान भी नहीं हुआ था. दिसंबर का महीना था. सरहद पार से पाकिस्तानी सेना गोली बारी कर रही थी. भारतीय जांबाज भी जबाव देने में पीछे नहीं थे. सीमा पर तैनात आकाश की एके 47 आग उगल रही थी. हांड़ कंपा देने वाली ठंडी हवाएं तेज हो गयी थी. भारी वर्षा के दौरान हिम स्खलन की आशंका ज्यादा बढ़ गयी थी. वैसे स्थिति में चांदनी की याद उसे बार बार आ रही थी. वह जितनी बार उसको अपनी यादों से पीछा छोड़ाना चाह रहा था, उतना ही उसकी बेवफाई उसे बिच्छू की तरह डंक मारती रही. पता नहीं इसी उधेड़बुन में उसका मन गांव की भूल भुलैया में कब भटक गया. जब वह चांदनी की शादी समारोह में शामिल होने गया था.

   जब आकाश चांदनी के घर पहुंचा तो वहां मातमी सन्नाटा पसरा हुआ था. जहां तहां लोग झुंड के झुंड खड़ा थे. आपस में शादी टूट जाने की बात बतिया रहे थे. कह रहे थे कि दो लाख रुपये के लिए बेचारी खामोखाह दहेज की बलिवेदी पर जिंदा चढ़ा दी गयी. लोग तो यहीं न कहेंगे कि लड़की भाग्यहीन है. अब उससे कौन विवाह करेगा? विवाह मंडप में चांदनी दुल्हन के वेश में अपनी सहेलियों के साथ गुमसुम बैठी हुई थी. वहीं उसकी मां का रो रोकर बुरा हाल था. उसके पिता शिवजी शर्मा माथे पर हाथ रखे एक कोने में मायूस बैठे थे. इतने समय में आकाश समझ गया कि लेन देन को लेकर बारात वापस लौट गयी है. अब चांदनी बिन ब्याही रह जायेगी. कभी दोनों एक ही साथ बीए तक पढ़ाई की थी. यकायक चांदनी का मासूम चेहरा उसके सामने नाच उठा. जब कॉलेज में दोनों की मुलाकात हो जाती थी. दोनों पड़ोसी गांव के रहने वाले थे. दोनों का संबंध किताब -कॉपी के लेने देन तक ही सीमित था.

   . तभी वह एक बूढे व्यक्ति के पास पहुंचा और कहा , ‘ काका , मैं चांदनी से शादी करना चाहता हूं. आप मेरी मदद करे. ’

   आकाश के निर्णय का सभी ने एक साथ स्वागत किया. उसका प्रस्ताव चांदनी और उसके माता पिता तक पहुंचाया गया. चांदनी ने कोई प्रतक्रिया व्यक्त नहीं की. उसकी चुपी को लोगों ने स्वीकृति मान लिया. लेकिन उसके पिता शिवजी शर्मा ने एतराज किया. कहा कि लड़के के माता पिता की बिना अनुमति के शादी नहीं हो सकती. चांदनी कोई भेड़ बकरी नहीं है, जिसे बार बार बलि का बकरा बनाया जाये.

   तब आकाश ने इस घटना की सारी जानकारी मोबाइल से अपनी मां को दी. साथ ही जल्द अपने पिता के साथ चांदनी के घर पहुंचने को कहा.

   आकाश सरपंच घनश्याम प्रसाद और उनकी पत्नी गायत्री देवी का एकलौता पुत्र था. दो साल पूर्व उसकी नौकरी सेना में हुई थी. उसके विवाह के लिए कई प्रस्ताव आये थे. लेकिन उसने सबकों नकार दिया था. आज बेटे की इच्छा जान कर मां गायत्री देवी ने तुरंत इसकी सूचना सरपंच साहब को दी. दोनों अपनी मारूति से चांदनी के घर के लिए रवाना हो गये.

   हालांकि सरपंच साहब का ओहदा व गरिमा से गांव जवार के लोग वाकिफ थे. ग्राम सभा में मामलों का निबटारा तो वह बखूबी कर लेते थे. बड़े से बड़े तथा छोटे से छोटे से मामले में उनका न्याय बेदाग रहता था. पंचायत उसकी प्रशंसा भी करती थी. लेकिन आज उनके दरबार में जो मामला आया था वह खुद उनके पुत्र का था. लोग हैरत के साथ आकाश और चांदनी के फैसले को दिल थाम कर सुनने के लिए व्याकुल थे.

   मारूति से उतरने के बाद दोनों सीधे मंडप में पहुंचे,जहां चांदनी बैठी हुई थी. सरपंच साहब ने उससे पूछा,‘ बेटी, मेरा पुत्र आकाश तुम्हारा हाथ मांग रहा है. तुम्हें कोई आपत्ति तो नहीं है ?

   उत्तर देने की बजाय चांदनी सरपंच साहब और गायत्री देवी के चरणों पर गिर पड़ी. दोनों ने उसे उठाकर गले से लगा लिया. सरपंच साहब ने कहा कि आज आकाश ने जो कदम उठाया है उसकी हम कद्र करते हैं. पंडित जी मंत्रोच्चारण शुरू कीजिए.... ’

   बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी. अचानक जोरों की आवाज के साथ आकाश जहां खड़ा था, .ठीक उसके 10 मीटर की दूरी पर हिम स्खलन हुआ.यकायक वह अपने ख्यालों से वापस लौटा. तभी उसी मोबाइल पर रिंग आया. उसने सेना के हेड ऑफिस का इमरजेंसी नंबर देखकर कॉल रिसिव किया. उधर से कहा गया कि सियाचिन ग्लेसिय में हिम स्खलन हुआ है. जिसमें जवानों के दबने की सूचना है. आकाश ने कहा कि मैं ग्लेसियर में हूं और सुरक्षित हूं. मेरे बगल में ही हिम स्खलन हुआ है. मलवे को हटाने के बाद मालूम होगा,कितने साथी उसमें फंसे हैं.

   दूसरे दिन अखबारों के पन्नों पर हिम स्खलन में छह जवानों के दबने की खबर प्रकाशित हुई थी. सभी टीवी चैनलों पर भी यह खबर प्रसारित हो रही थी. बचाव कार्य में सेना के जवान और हेलीकॉप्टर लगे हुए थे. लेकिन कौन कौन जवान हिम स्खलन में दबे हुए थे. इसकी खबर अभी प्रसारित नहीं हुई थी. जिससे जवानों के परिजन और अन्य लोगों में जानने की बेचैनी बढ़ गयी थी.

   चांदनी ने जब टीवी पर यह खबर देखा तो उसका भी होश उड़ गया. इस नई मुसीबत ने उसकी दिल की धड़कने बढ़ा दी. तुरंत आकाश की मोबाइल पर कॉल किया. मोबाइल सेट पर रिंगटोन बजता रहा. उसने रीसिव नहीं किया. इससे उसकी व्याकुलता और बढ़ गयी. उस रात की घटना याद कर उसे अपने आप पर शर्म आने लगी. जिस इंसान ने विपरीत परिस्थितियों में उसके घर की इज्जत को बचाया था. उसे घटना को याद कर उसका रोम रोम कांप उठा. उसने शराब के नशे में आकाश पर न जाने क्या क्या आरोप लगाया था. शराब की बोतल से वार कर उसका सिर फोड़ दिया था.यह सब शराब के कारण ही हुआ. सारी बुराइयों की जड़ शराब है पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ. उसने संकल्प लिया कि अब वह शराब की बोतलों को छुएगी भी नहीं, ताकि आकाश तनाव मुक्त रह सके. उसने अलमीरा में रखे शराब की बोतलों को निकाला और नाली में फेंक दिया. उसके दिल ने कहा कि न रहेगी बांस न बाजेगी बांसुरी.

   इस संकल्प से उसके मन का बोझ थोड़ा हल्का हुआ. उसने सोचा कि आकाश उसे मिल जाये तो अपने किये की माफी मांग ले. उसने फिर उसे कॉल किया. रिंग होता रहा लेकिन उसने उठाया तक नहीं. कहीं हिम स्खलन में वह भी .... ,यह सोच सोच कर उसकी रूह कांप उठी. तभी उसे आकाश की बतायी एक बात याद आई. जब दूर संचार फेल हो जाये और संपर्क न हो तो तब सीधे हेड ऑफिस चले जाना. हेड ऑफिस की बात याद आते ही उसके पैरों में पंख लग गये. वहां जाने के लिए घर से पैदल ही निकल पड़ी. निराशा व हताशा में उसे यह भी विवेक नहीं रहा कि अपने चालक को बुला ले. चलते चलते वह थक गयी थी. एक चढ़ाई पर सैनिक वाहन की चपेट में आ कर सड़क पर गिर पड़ी.

   सैनिक अस्पताल में चांदनी के पर्स की तलाशी ली गयी. उसमें एक विजिटिंग कार्ड मिला. जिसके आधार पर आकाश को घटना की सूचना दी गई.सूचना पाते ही आकाश अस्पताल पहुंचा. उसे लगा चांदनी के कारण ही उसकी जान बच गई, नहीं तो हिम स्खलन के दौरान सियाचीन गलेसियर में ही उसकी समाधि बन गई होती. अस्पताल में चांदनी वार्ड तीन के पांच नंबर बेड पर बेहोश पड़ी हुई थी. उसे सांस लेने में तकलीफ हो रही थी. उसकी नाक में ऑक्सीजन की नली लगी हुई थी. डॉ डीके वर्मा ने कहा कि कोई परेशानी की बात नहीं है. मरीज का एक छोटा सा ऑपरेशन होगा. तब लांस ठीक काम करने लगेगा.

   दूसरे दिन ऑपरेशन के बाद चांदनी को उसके बेड पर सुला दिया गया था. वह अनाप शनाप कुछ बक रही थी. पास खड़ी नर्स ने आकाश को बताया कि मरीज को होश आने में लगभग दो घंटे लग सकते हैं.

   चांदनी को इस रूप में देख कर उसका मन भर आया. उसका दिल उससे बात करने के लिए बच्चों की तरह मचलने लगा. दो घंटे का एक एक पल उसे कई वर्ष लगने लगा. वह अस्पताल के कैंटीन में आ गया. एक कोने में बैठ कर समय बिताने के लिए कॉफी का ऑर्डर दिया. उसकी टेबल पर बैरा कॉफी की प्याली रख गया. एकाध चुश्की लेने के बाद उसका मन अशांत हो गया. चांदनी की यादों में फिर बहक गया. जब वह चांदनी से मिलने के लिए उसके मायके गया हुआ था.

   आषाढ का महीना बीत चुका था. सावन मास का प्रथम सप्ताह चल रहा था. प्रतिदिन रिमझिम बारिश होने लगी थी. भीषण गर्मी से झुलसी प्रकृति रानी हरीभरी हो गयी थी. लगता था कि वह हरियाली की चुनरी ओढ़ कर नव नवेली दुल्हन की तरह घूंघट काढ़े बैठी हो. आकाश में काले काले बादल उमड़ रहे थे. उमड़ते घुमड़ते बादलों को देख चांदनी अपने बाग में झूला झूलने निकल गयी थी. जहां आम,कटहल, नीम, जामुन, महुआ कदम आदि के पेड़ हवा में झूम रहे थे. पेड़ों पर बंधे झूले पर बैठी एक एक युवती कजरी गा रही थी. ‘ नाही अइले पिया निरमोहिया,सुनी लागे सेजरिया..., वहीं दूसरी सहेली,‘ घिरि आये रे बदरिया, साजनवा आयो ना...’ पर धीरे धीरे थिरक रही थी. ठीक उसी समय मौसम ने अंगराई ली. आसमान से बंदाबांदी होने लगी. तभी आकाश वहा पहुंचा. सहेलियों ने उसे पकड़ कर चांदनी के झूले पर बैठा दिया. चांदनी लाजवंती की तरह लजा कर झूला से उतर कर भागना चाही. तभी सहेलियों ने उसे पकड़ कर आकाश के बगल में बैठा दिया. ससुराल की सालियों के साथ उसका हंसी दिल्लगी चलता रहा. हंसी ठिठोली के बीच कब समय ठहर गया , उसे पता नहीं चला. दोनों को एकातवास देने के लिए एक एक कर वहां से सहिलेयां रफ्फू चक्कर हो गई. बस चांदनी के साथ आकाश रह गया था. इसी बीच एकाएक बिजली कौंधी और बादल गर्जा. झमाझम पानी बरसने लगा. बादलों की गर्जना से भयभीत चांदनी मारे डर के आकाश के सीने से चिपक गई. दोनों के वस्त्र भिंगते जा रहे थे. चांदनी के सुकोल अंगों का उभार दृष्टगोचर होने लगा था. इसी बीच आकाश ने चांदनी से पूछा,

   ‘कैसी हो चंदनी?’

  ‘देखते नहीं सूख कर कांट हो गयी हूं. कोई अपना रहे तब न हाल चाल जाने....’ उसने तिरसी नजरों का वाण उस पर चलाया.

  ‘ चलो , बेगाना ही सही अपनों का हक जताने तो कम से कम इस बारिश में आ गया. ...अब तो मुस्करा दो.....’ आकाश उसे अपने अंक में भरते हुए उसके होंठों को चूम लिया.

   इसी बीच बैरा कॉफी का प्याली लेने पहुंचा. उसने आकाश से कहा कि साब, ‘आपकी कॉफी तो ठंडी हो गयी है , दूसरी ला दूं....’

  ‘ओह, नहीं नहीं, रहने दो. ’ आकाश अपने खयालों से वापस लौटा. और , घड़ी की ओर देखा. दो घंटे का समय पार हो चुका था. वह अस्पताल की ओर भागा.

   चांदनी होश में आ गयी थी. जब आकाश उसके सामने जाकर खड़ा हुआ तो वह उसे एकटक देखने लगी. जैसे वर्षों से खोया हुआ उसका स्वर्ग यकायक मिल गया हो. आकाश को सकुशल देख कर उसकी आंखें नम हो गई. उससे कुछ कहना चाह रही थी,‘आकाश , मुझे माफ करना.तुम्हें बहुत सताया है.’ लेकिन होंठ कंप कंपा कर रह गये. तब पास रखे एक कुर्सी पर आकाश बैठ गया. उसने चांदनी का हाथ अपने हाथों में लेकर सहलाया. फिर माथे पर हाथ रख कर उसकी लटों से खेलने लगा. हाथों का स्पर्श पाकर मारे खुशी के चांदनी की आंखें बरस पड़ी.


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