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वर्ष: 1, अंक 15, जून(द्वितीय), 2017



नाखुश रहने की आदत

डॉ०अनिल चड्डा

नाखुश रहने की जब तेरी आदत ही है बन जाये,
खुशियों की तदबीर तुझे फिर किस तरह से समझायें ।

बातों ही बातों में यहाँ पर पूरे जन्म का साथ बने,
 राहों में मिलते हैं जो भी, भूल उन्हें हम कैसे पायें । 

वादे तो करते हैं सब ही, झूठ की ये दुनिया है लेकिन,
जो हैं दिल से वादा करते, वादे वही निभा पायें ।

तरह-तरह के आईने मिलते, शक्ल समझ नहीं आती है,
जैसी शक्ल दिखाना चाहो, अक्स वही तो दिखलायें ।

देखे ‘अनिल’ ने बड़े ही सपने, लेकिन सब रह जाते अधूरे,
इसीलिये सपने जो भी देखें, यकीं कंभी न कर पायें ।
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