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वर्ष: 1, अंक 15, जून(द्वितीय), 2017



दुर्लभ पिण्ड

कवि : श्री विष्णु पण्ड्या
अनुवादक :डॉ.रजनीकान्त एस.शाह



कैसा दुर्लभ पिण्ड़ है तुम्हारा
वर्षा –हेमंत-शिशिर 
या वसंत से न मोह न माया ।
न किसी आश्वती(आश्वासन) की एषणा 
आगमन तुम्हारा 
तपती मध्याह्न वेला में
भूतलजल सूख गए हो,
सूर्य अपने प्रखर मिजाज में 
और वृक्ष ,लता-पौध की 
तृषा संतप्त 
आँख का आँसू होठों पर प्यास का 
एक बिन्दु ही बन जाए ...
तब तुम आते हो ।
ग्रीष्म की तपती दुपहरी में और तप्त रात्री में 
पसरती हैं अस्तित्व की जड़ें ।
खिल उठते हैं अनहद रंगीन पुष्प,
मेरे झरुखे की सुबह को 
रम्य कविता में
परिवर्तित कर देती है .... 
हरएक शाख सलाम करे 
मुस्कान सहित झुककर 
पूछता हूँ तुम से कि
‘किस प्रिय पात्र की छलकती स्मृति 
इतना खिलाती है तुम्हें मित्र !
या फिर तुम भी असीमित वेदना की संतान ?
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