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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 86, जून(प्रथम), 2020

झूठे रिश्ते

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

देर शाम तक मौसम रौद्ररुप दिखाता रहा | ओलों भरी बरसात ने मई के महीने को जनवरी जैसा ठण्डा बना दिया था | मौसम के इस बदलाव को रामेश्वर सहन नहीं कर पाये | रात बारह-एक बजे के बीच उनकी तबियत एकदम से बिगड़ गई | सर्दी-जुकाम ने उनके गले को बंद कर दिया | उन्हें घुटन सी महसूस हुई तो अपनी पत्नी को नींद से जगाकर सारा हाल बता दिया |

पत्नी भागी-भागी गई और बड़े बेटे के कमरे का दरवाजा खटखटाने लगी | बड़ी मुश्किल से बेटा जागकर बाहर आया |

‘क्या हुआ माँ ?’ उवासी भरता हुआ बोला |

रामेश्वर की पत्नी ने सारा घटनाक्रम बताया तो बेटे ने एकदम से अपने सिरपर दोनों हाथ मारे और बोला -‘ये लक्षण तो कोरोना के हैं |’

कोरोना का नाम सुनते ही सारे घर में हलचल सी मचगई | एक भयंकर डर ने सभी के सोचने-समझने की क्षमता को शून्य कर दिया | आनन-फानन में रामेश्वर के कमरे को बाहर से ताला लगा कर बंद कर दिया गया |

बेचारे रामेश्वर सुबह तक खाँसते-हाँफते हुए किसी तरह जिंदा बने रहे | सुबह तड़के सरकारी एम्बुलेंस आई और उन्हें ले गयी | पूरा परिवार दूर से ही उन्हें जाता देखता रहा | रामेश्वर जी को लग रहा था कि वे हास्पिटल नहीं यमपुरी को जा रहे हैं |

कुछ दिन बाद पता चला कि रामेश्वर को कोरोना नहीं हुआ था, क्योंकि उनकी हर रिपोर्ट निगेटिव आई थी | मौसम के बदलाव की वजह से सामान्य खांसी जुकाम ने उनके शरीर में कोरोना वायरस संक्रमण जैसे लक्षण पैदा कर दिये थे |

रामेश्वर के घर वालों को उनके पूर्ण स्वस्थ होने का समाचार जैसे ही मिला | बेटा-बहू, पत्नी सब उन्हें लेने हॉस्पीटल पहुँच गये | पर यह क्या रामेश्वर ने घर जाने से स्पष्ट मना कर दिया | वे शहर के वृद्धाश्रम में जाने का फैसला पहले ही कर चुके थे, क्योंकि उस रात उन्हें झूठे रिश्तों की असलियत पता चल चुकी थी |

रामेश्वर की घरवाली दूर खड़ी मुंह में साड़ी का एक कोना दबाये रो रही थी तो दूसरी ओर खड़े बेटा-बहू रामेश्वर को मिलने वाली तीस हजार प्रतिमाह की पेंशन के मातम में फूट-फूटकर रो रहे थे, और रामेश्वर जी मुस्कराते हुए वृद्धाश्रम की गाड़ी में बैठकर चले गये |


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