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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 86, जून(प्रथम), 2020

सड़क किनारे

मनप्रीत सिंह संधू

एक दिन रात का समय था, एक गरीब आदमी जो रिक्शा चलाता था, रात को अपने घर लौट रहा था। उसको ‘सड़क किनारे’ एक आदमी खड़ा दिखाई दिया, वहाँ से एक बच्चे के चिलाने की आवाज आ रही थी। उसने पूछा भाई कौन हो तुम, यहाँ क्या कर रहे हो, वह आदमी जल्दी से वहाँ से भाग गया और आगे उसकी गाडी खड़ी थी, उसमें सवार होकर भाग गया और अपने साथ अपनी नव जन्मी बच्ची को वहाँ फैंक गया। जब उस गरीब आदमी ने बच्ची को देखा तो वह रक्त से लिपटी हुई रो रही थी।

उस रिक्शे वाले ने बच्ची को उठाया और सीधा अस्पताल ले गया। वहाँ उसने बच्ची का ईलाज करवाया, और साथ ही वह गरीब आदमी बहुत चिंतत था, मैं बहुत गरीब हूँ, इसको मैं अच्छा भविष्य कैसे दे सकता हूँ।

इतने में डाक्टर साहिब बाहर आये और उन्होंने कहा “आपकी बच्ची अब ठीक है”

शामसुंदर ने कहा “डाक्टर साहिब यह मेरी बच्ची नहीं है, इसका पिता वह है, जो इसे सड़क किनारे फैंक कर चला गया। उसने कहा मैं बहुत गरीब हूँ, मेरे पास पहले भी एक बेटी है। मैं इस बच्ची को अच्छा भविष्य नहीं दे सकता हूँ।”

डाक्टर- “नहीं इसके असली पिता आप ही हैं, जो इन्हें जीवन दे सकता है, वह इसे भविष्य भी दे सकता है। जो इस बच्ची को फैंक कर गया है, वह इसका असली पिता नहीं हो सकता।”

डाक्टर की इस बात को सुनकर शामसुंदर बहुत प्रभावित हुआ। उसने तभी मन में फैंसला किया कि इस बच्ची को वह अपने घर ले जायेगा और इसको भी अपनी बेटी की तरह प्यार करेगा। रात भी बहुत हो चुकी थी, वह बच्ची को लेकर अपने घर गया। घर पहुंचकर शामसुंदर ने अपनी पत्नी को पूरी घटना बताई। उसकी पत्नी भी बहुत बड़े दिल वाली थी।

शामसुंदर- “देखो इस बच्ची को अगर तुम अपनी बच्ची की तरह प्यार कर सकती हो तो बताओ, दोनों आज से हमारी बच्चियां हैं। अगर नहीं कर सकती तो भी मुझे बताओ।”

पत्नी- “आप क्या बात कर रहें हैं? मैं घर आई लक्ष्मी को कैसे मना कर सकती हूँ। मैं इसको अपनी बच्ची समझकर प्यार करूंगी।”

उनकी बच्ची का नाम ‘कविता’ था, इस बच्ची का नाम ‘लक्ष्मी’ रख दिया गया। अब शामसुंदर पर और भी ज़िम्मेदारी बढ़ गई थी। वह नहीं चाहता था, उसके बच्चे उसी की तरह गरीब ही रहें। उसने बहुत मेहनत की और दोनों बेटियों को अच्छी पढ़ाई करवाई। वह और उसकी पत्नी ने बहुत गरीबी झेलते हुए उस बच्ची को पढ़ाया।

जब बच्ची बड़ी हुई तो उन्होंने बच्ची को बता दिया, उन्होंने उसको ‘सड़क किनारे’ से उठाया था, उसका पिता उसे वहाँ फैंक गया था। लक्ष्मी बहुत समझदार थी, उसने तभी से अपने मन में सोच लिया था कि वह जीवन में कुच्छ अच्छा करेगी। वह अपने माता-पिता की गरीबी को दूर करने के लिए बहुत मेहनत करने लगी। लक्ष्मी पढ़ाई में बहुत अच्छी थी। कई बार स्कूल में पहला स्थान हासिल कर चुकी थी। स्कूल में माता-पिता को बुलाया जाता था, लेकिन वह गरीब होने कारण नहीं जाते थे, कोई उनका मज़ाक न बनाये इसलिए।

बेटियाँ अब बड़ी हो गई, उनको पढ़ाने के लिए अधिक पैसों की आवश्यकता थी। शामसुंदर ने अब रिक्शा चलाना छोड़ कर कोई और काम शुरू किया, जिससे अधिक पैसे कमाये जा सकें। अब लक्ष्मी को घर से बाहर पढ़ने के लिए जाना था, तो शामसुंदर बहुत चिंता में डूब गया। उसने अपनी पत्नी से बात-चीत की और उसकी पत्नी ने कहा हम लक्ष्मी को पढ़ने के लिए बाहर भेजने को तैयार हैं, आप चिंता मत कीजिए, सब कुच्छ ठीक होगा, ऐसा उनका विश्वास था। लक्ष्मी ने भी अपनी पढ़ाई दिल लगाकर की, क्योंकि वह कुच्छ बनना चाहती है और अपने पिता की गरीबी को दूर करना चाहती है।

एक दिन आया जब लक्ष्मी ने आई.पी.एस. की परीक्षा पास कर ली। हर जगह पर लक्ष्मी की ख़बर आ रही थी। सभी लोग लक्ष्मी की मेहनत से बहुत प्रसन्न हुए। शामसुंदर और उसकी पत्नी तो एक दम खुशियों से भर गये थे।

लक्ष्मी अब बड़ी अफ़सर बन चुकी है, उसको बहुत जगह पर सम्मानित किया गया। एक दिन लक्ष्मी के पूरे परिवार को किसी सभा ने बुलाया, वहाँ शामसुंदर और उसकी पत्नी गये।

लक्ष्मी सभा में बोल रही थी और शामसुंदर उसको सुन रहे थे, तभी लक्ष्मी ने आकर अपने पिता के पैर पकड़े और गले मिल रोने लग गई।


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