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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 86, जून(प्रथम), 2020

पुलिस को सबक

आशीष श्रीवास्तव

लॉकडाउन हुआ तो अक्की और अनु के मजे हो गए। पहली बार दोनों छोटी बहिनों ने सुबह-शाम एक साथ माता-पिता और दादा-दादी के साथ सोशल डिस्टेंसिंग में समय बिताया। एक साथ भोजन किया और तरह-तरह के परंपरागत खेल घर में रहकर सीखे। दोनों बहिनें दिनभर घर में ही मस्ती करतीं, कभी सांप-सीढ़ी, कभी अष्टे-चंगे, कभी, कैरम या शतरंज खेलती और शाम को मम्मी-दादी संग स्वादिष्ट व्यंजन बनाना सीखतीं। स्कूल जाने या पढ़ाई करने से बेफिक्र बचपन को देखकर सभी खुश। अक्की ने मम्मी की पुरानी साड़ी का झूला बना लिया, दोनों बारी-बारी से झूलतीं। सुंदर-सी पेंटिंग घर के बाहर लगादी और लिख दिया: कोरोना मतलब कोई रोड पर न निकले। खुद बचें औरों को बचायें। घर के बाहर झांकती तो देखती सन्नाटा पसरा है। चौराहे पर पुलिस का पहरा। दुकानें बंद। यूं ही एक सप्ताह बीत गया कि एक दिन मोहल्ले में मंुह पर मास्क बांधे, दो पुलिस खाकीवर्दी में आई और सभी से अपने-अपने घर में रहने का आग्रह करने लगी। अक्की घर में चाय बना रही थी। अक्की के पापा ने पुलिस को सोशल डिस्टेंसिंग में चाय पीने का निवेदन किया। तभी छोटी-सी अनु अपनी प्यारी-सी तोतली आवाज़ में बोल पड़ी: आपको समझ नहीं आता, इतने बड़े हो गए, जब सब घर में हैं तो आप क्यों सड़क पर घूम रहे हैं। ये पेंटिंग नहीं देख रहे? हम बच्चे घर में रह सकते हैं तो आप क्यों नहीं। इतना सुनना था कि बालसुलभ बातों में आकर सब ठहाका लगाकर हंस पड़े। पुलिस ने जाते हुए दूर से ही हाथ हिलाया और कहा: हांॅ बेटा ये समय घर पर ही रहने का है। नमस्कार।


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