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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 86, जून(प्रथम), 2020

नया सवेरा

महेन्द्र देवांगन माटी

नया सवेरा आ गया, जाग उठो इंसान । स्वागत कर लो भोर का, नहीं बनो शैतान ।। खील गई है बाग में, कलियाँ चारों ओर । चिड़िया चहके नीड़ में, मचा रही है शोर।। टन टन घंटी बज रही, मंदिर जाते लोग । पूजा करते प्रेम से, लेकर छप्पन भोग।। कोरोना अब दूर हो, माँगे सब वरदान । संकट सबके टाल दो, दया करो भगवान ।। माटी को अब चूमकर, "माटी" तिलक लगाय। इस माटी से प्रेम है, प्राण इसी में जाय।।

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