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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



अकाब पर प्रतिक्रया


मधु


अकाब पढ़ा पढकर जो प्रतिक्रया हुई उसे लिखा है :---------

अकाब के आखिरी पन्ने से पहले और अंतिम पंक्तियों से कुछ पहले, को पढ़ कर, ताली बजाने का मन हो आया ‘ इसे कहते है मास्टर स्ट्रोक , प्रबोध जी ने सीधा बड़ा सिक्सर मारते हुए अपनी कहानी को अंजाम दिया और क्या अंत किया ! कि पुस्तक पढ़ना सार्थक हो गया ।

“ ---अनन्या चलती- चलती किसी दूकान में घुस गयी --------------------------वह किसी किताबों की दूकान में घुसकर रास्ते में पढ़ने के लिए नॉवल ढूँढ रही थी । तभी चहकती हुई अनन्या शीशे का दरवाज़ा खोलकर बाहर निकली । उसके हाथ में एक किताब थी । शायद कोई उपन्यास था ।------------ नॉवल का नाम था ‘अकाब ‘ ।”

यहाँ ही प्रबोध जी के एक महान उपन्यास कार होने का सबूत मिला , इस पाठक के दिल पर तीर गहरा गढ़ गया । “अकाब” ने सम्मोहित किया एक अनोखा आईडिया , पुस्तक का टाइटल जिज्ञासाओं को जन्म देता हुया , प्रबोध जी का “जल तू जलाल तू “ कनाड़ा के नियाग्रा फ़ाल्स के तट पर था तो यह न्यू योर्क में सैट किया गया है “ दुनिया के तमाम वाद अपनी बिसात बिछाने यहाँ जरूर आते है “ महादेश अमेरिका के लिए लेखक ने शत प्रतिशत सही कहा और गुजराती तो जैसे न तैसे तिकडम भिड़ा कर अमेरिका जाने का सपना देखता है उसका अंतिम लक्ष्य बस और बस अमेरिका है , गुजरात में हर चौथे घर का कुंडा खटखटायो तो भीतर से एन. आर .आई . झांकेगा !

लेखक पूरे ब्रह्माण , पूरे संसार के नभ पर विचरण करता है चूकीं ,वह अकाब है । लेखक की कलम चली और चलती गयी अकाब के पंखों पर बैठ कर पूरे भूतल पर ही नही महीन मानवी रिश्तों , भाव- भावावेश ,भावनायों ,संवेदनायों , रिश्तों के दर्द, कड़े संघर्ष ,भांति-भांति के दर्द ,वेदना ,संताप ,सुख - संतोष- के लम्हों पर गिद्ध दृष्टि ड़ाल कर पाठक को ले गया , अपने विशाल पंखों पर बिठाकर बेलगाम उड़ान भरता हुया , कोई भी रस अछूता नही रह गया ।

अकाब को धरती पर लज़ीज़ गोश्त नज़र आया तो वो मंडराता हुया अपनी पैनी दृष्टि लक्ष्य की ओर साधे झपट्टा मारता है , और लोहे के विशाल विमान रुपी आकाबों ने विश्व की सबसे लज़ीज़ वर्ल्ड- ट्रेड- टॉवर पर झपट्टा मार न मालूम कितने हज़ारों गोश्त से अपनी भूख मिटाई ।

मनु के पुत्र पुत्री, आदम हौवा का सत्य जिसे हमेशा परदा ड़ाल कर लिखा जाता रहा है उसे उसके मूल रूप में दिखाना सबके बस की बात नही है । प्रायः लेखक की कलम ठिठक जाती है वो उसे भद्रता और शालीनता की झीनी ओढ़नी ओढा कर इस तरह पेश करता है जैसे दुल्हिन का चेहरा घूँघट में । किन्तु अकाब ने बेबाकी से तन से जुड़े अहसास बखूबी मुखरित किये है ; शिशु के बदनपर ममता के तेल मालिश माँ की अँगुलियों का उसके अंग- अंग पर नर्तन , अकाब के नायक तनिष्क को कभी नही भूला ;

“माँ असानिका उसके सिर,पीठ ,पेट और पैरों के साथ-साथ उसके जांघों पर भी अपनी जादुई अँगुलिया फिराती और अपनी तेल भरी हथेलियों पर नन्हें तनिष्क कि नन्हीं सूसू को मसल -मसल कर मज़बूत बनाती ------------सिर पर हरे पत्तों की चादर बिछाये तनिष्क खिलखिलाता रहता –”

किस माँ ने अपने नन्हें बालक की ऐसी मालिश नही की होगी ? और कौन अबोध बालक खिलखिलाकर नही हँसा होगा?, परन्तु किस लेखक ने ऐसा दुर्लभ शब्दचित्र बनाने का साहस किया होगा ? यही नही जन्म देने कि प्रक्रिया के पीछे मादा व् नर शरीर का जुडना लेखक ने सहज भाव से वर्णित किया है । गृहस्थी बसाना और ब्याह करने के मूल कारण का शारीरिक आकर्षण ,उसे नकारा नही जा सकता । प्रक्रति का नियम है तब झिझक कैसी ? सच पूछिए तो एक नया आविष्कारक शब्द संचालन किया जब ‘गोमांग’ उर्फ ‘लामा’ ने उसे गृहस्थी जमाने का गुरु मन्त्र दिया और ब्याह के लिए उपयुक्त पात्र कौन ? उसे परिभाषित किया ।

“इंद्री पकड़कर गृहस्थी बसाना और स्त्री की छाती को अपने बच्चे के लिए दूध का बर्तन ” बनाना जैसी सर्जनात्मक शब्द चित्र को लेखक ने जन्म दिया है ।

याद आता है एक आई. ए .एस. अधिकारी बैनर्जी साहब का दिया नुस्खा ,विवाह के लिए उपयुक्त कन्या कौन?

उनका विवाह के लिए प्रस्तुत लड़के से सिर्फ एक बिना लाग लपेट के सीधा प्रश्न पूछना ,“ क्या तुम इसके साथ सोना पसंद करोगे?”

कभी- कभी नोवल में सिडनी शेल्टन की बू आती है और उसे पोर्नो के हाशिए पर ला खडा करती है , परन्तु चूकीं अकाब का नायक एक मजाज़ करने वाला है , अतः उसके व्यवसाय में नग्न शरीरों का होना लाज़मी है ,लेखक ने उसके अनुभव उसी की तरह पेश किये है ।

जैसे हम रामचरित्र मानस का विवादस्पद दोहा ,“ ढोल ,गंवार , शुद्र अरु नारी ,ये सब ताडन के अधिकारी ” का अर्थ, ( कुछ शोध –कर्तायों के अनुसार), उपरोक्त दोहा तुलसीदास जी ने सागर के मुख से कहलवाया है अतः जड़ बुद्धि जलधि के अपने विचार है । लेखक प्रत्येक पात्र के चरित्र में घुस कर उसके ही अनुरूप उसके ही अनुभवों को लिखता है , अतः तनिष्क का कार्य क्षेत्र उसे जहाँ ले जाता है , लेखक की कलम उसे उसी के अनुभवों के आधार पर कलम बद्ध करता हैं । हो सकता है कुछ पाठकों यह अरुचिकर लगे ।

अकाब के पंखों पर बैठ कर संसार घूम लिया , अनेकों भौगोलिक भू -तलो , परिवेशों ,सभ्यतायों , असभ्यताओं के ऊपर मंडराता है ,ऊपर से नीचे की ओर ,कभी बहुत नजदीकी से ,कभी सरसरी नज़र भर डालता हुया, कभी आकाश में ऊँची उड़ान भर किसी और मंजिल पर पहुँच जाता है ।

लेखक प्रबोध गोविल जी का यह नया अवतार निश्चय ही उन्हें पूरे विश्व में ख्याति प्रद्दत सिद्ध होगा ।

उन्हें अनेकों शुभकामनाएं ।

मधु
sosimadhu@gmail.com


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