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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



धरती माँ


डॉ दिग्विजय कुमार शर्मा "द्रोण"


  
जब पाप बढ़े इस भू तल पर 
तब तब यह करवट लेती है।

जब जब  गरीब का मन रोता
तब तब भू आपा खो देती है।

चाहे कन्या भ्रूण हत्या हो 
तब तब भू करवट लेती है।

जब स्वार्थ के आगे धर्म झुके 
तब तब यह रक्षा करती है।
 
जब जब है इस पर पाप बढ़े 
तब तब पापियों का नाश करती।

जब जब कोई पापी पाप करे
तब तब एक चेतावनी देती है।
 
किसी कन्या का जब सत् हरे 
तब तब उसको बल देती है।

जब जब धरती करवट लेती 
तब ज्वालामुखी बनकर फटती। 

जब जब भू आप खो देती 
तब जग को सुनामी देती  है।

जब जब बोझ बढ़ा इस पर
तब अकाल, अतिवृष्टि होती।

भू करवट लेती इंसां को तब 
कहती है संभल जाओ अब तुम।

यदि न संभले अब भी तुम तो 
प्रलयकाल के गाल आ जाएगा।

जब जब धरती करवट लेगी 
तब  तेरा सर्वनाश हो जाएगा।

बच ले अब तू पापों से यहाँ
न कर तू  दुष्ट नरसंहार यहां।

जीवन को तू बना नहीं सकता 
फिर क्यों उसे रौंद रहा तू यहां।

कन्यास्वरूप देवी है उसकी 
इज्जत करना तो सीख जरा।

मद में तू घुल गया है जग के 
रिश्ते सब तू भूल गया अपना।

क्या अच्छा, क्या बुरा इसका 
फर्क तू अब कर ले  यहाँ जरा।

जब इंसान सुन ले बात जरा
धर्म की राह पर  भी चले जरा।

तब धरती खुश होकर हंसती 
तब इंसान का पालन करती है। 

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