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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



पराये हो गये


डॉ० अनिल चड्डा


 
अपने ही घर में पराये हो गए,
साथी हमारे ही साये हो गए ।

जुबां से तो बोली नहीं कोई बात,
खता जाने क्यों हमसाये हो गए ।

बड़ी कशमकश थी निगाहों में उनकी,
बहुत देर हाले-दिल सुनाये हो गए ।

ख्याल तेरा आता नहीं अब, 
बहुत दिन सपने भी आये हो गए ।

रिश्ता हमेशा बदलता है साकी,
ज़माने तुम्हे ये बताये हो गए ।  
 

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