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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



बेशर्मी का भोग


डाॅ. शशि तिवारी


जिस देश में एक आबादी ऐसी रहती है जिसे दो वक्त का भोजन भी उपलब्ध नहीं है, जीवन चलाने के लिए कड़े संघर्ष के चलते असमय ही दम तोड़ देना मजबूरी हो जाता हो, एक बड़ी आबादी आवास विहीन है, एक बडी आबादी गांव में सुविधा के अभाव में जी रही है जो देश विश्व में सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश हो उस लोकतंत्र में जनतंत्र का ही प्रतिनिधि निर्लज्ज हो एक नहीं दो नहीं तीन-तीन बंगलों का सुख सरकारी खजाने पर गिद्द भोज दृष्टि से जुटे हुए। क्षेत्र में भ्रमण के नाम पर महंगी लक्जरी गाड़ियों का उपयोग, ठहरने के नाम पर फाइव स्टार होटल से कम पर समझौता नहीं। गरीब जनता के टैक्स पर ये राजसी ठाट बांट गरीबों का तो मजाक है ही साथ बेशर्मी भी है। देश की सर्वोच्च न्यायालय ने भी मुफ्त का चंदन घिसने वालों को 2016 में भी न्याय को चाबुक चलाया था। कह चुका था पूर्व मंत्री एवं मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले रखने का मनमाना कनून भी उ.प्र.राज्य सरकार का रद्द कर दिया। होना तो यह चाहिए था कि कोर्ट के आदेश का सम्मान कर तत्काल सरकारी बंगले खाली करा लेना चाहिए था लेकिन खाली कराने की जगह राज्य सरकार ने ही इसमें संशोधन कर दिया। यहां यक्ष प्रश्न उठता है यदि केाई सरकार किसी राज्य में बहुमत मे है तो इसका यह कतई मतलब नहीं कि वह अपनी सुख-सुविधा को ले ऊलूल-जलूल नियम बना लें। लोकतंत्र मंे इसे कहीं से भी, किसी भी स्तर से उचित नहीं ठहराया जा सकता। चूंकि अब पुनः उ.प्र.राज्य शासन के ऊलूल-जुलूल निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय पुनः रदद ही कर दिया है तो अब बिना किसी हीला-हवाली के तत्काल ऐसे अपात्र लोगों को बंगले का मोह त्याग देना ही मर्यादा के अनुकूल होगा। शेष राज्य भी इसी के अनुरूप अपने स्तर पर फैसला ले ऐसा सर्वोच्च न्यायालय ने कहा। ऐसा कर एक स्वस्थ्य परंपरा का निर्वहन करें। इसी तरह नेताओं की देखा-देखी कुछ अधिकारी भी इसी तर्ज पर चल सरकारी बंगलों पर अवैध कब्जा जमाए बैठे हैं। वो भी सोचते है जब एक सेवक अर्थात् जनता का प्रतिनिधि बंगले पर अवैध कब्जा जमाए हुए बैठा है तो शासन का सेवक ऐसा क्यों नहीं कर सकता? यदि बार-बार सर्वोच्च न्यायलय इस तरह के निर्णय दे, अपना चाबुक चलाए यह स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए एक घातक संकेत हैं। प्रत्येक राज्य की सरकार को अब यह देखना होगा कि किन-किन के पास एक या एक से अधिक बंगले है। क्या यह नियम संगत हैं? यदि नही तो तत्काल इनसे ये बंगले अपने ही स्तर से खाली कराये जाना चाहिए। निःसंदेह कोई भी मंत्री भूतपूर्व होने के बाद मात्र एक आम नागरिक की तरह ही होता है फिर विशेष सुविधा क्यों?

बंगलों पर अवैध कब्जा एक डाके से कम नहीं है, जनप्रतिनिधि है पनौती नहीं। आजकल एक चलन नेताओं और अधिकारियों में चल सा पड़ा है। एक से अधिक वाहनों को पात्रता से अधिक अपने बंगले पर रखने पर देर सबेर कोई जनहित याचिका लगा सकता है। यहां फिर यक्ष प्रश्न उठता है जब सेवक है तो मालिक की तरह शान-ओ-शौकत और व्यवहार क्यों?


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