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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



मरने वाला आदमी


अर्चना ठाकुर


वो बेतहाशा भागा जा रहा था| कहाँ मुड़ना है, कहाँ रुकना है, किस गली किस चौराहे से रास्ता बदलना है सबसे विरक्त उसके कदम बस भागे जा रहे थे| उसकी पूरी देह पसीने से लथ पथ हो चुकी थी| फूलती सांसे भी उसको दो पल विश्राम का न कह सकी| अस्त व्यस्त कपड़े, बिखरे बाल ,बिना शेविंग का बुझा मुड़ा तुड़ा चेहरा लिए वो एक बार पीछे देखता है| जब आश्वस्त हो जाता है पीछा कर रहे कदमो को वो काफी पीछे छोड़ आया तो कुछ पल के लिए वो रुकता है| दीवार का सहारा लिए अपनी फूलती सांसो पर काबू पाने का प्रयन्त भी करता है पर मन के उद्वेग उसके ज़ेहन में एक कसैला पन सा भर देते है| थके शरीर को दीवार से टिकाए अब अपने आस पास के अपरिचित वातावरण को वो देख रहा था| वो छुपी गली के कोने में खड़ा था| उसके सामने गली के आगे खुले स्थान में भीड़ का हुजूम था, चलती आवाज़े जल्द ही उसे बता देती है कि अब वो रेलवे स्टेशन के मुहाने पर खड़ा है| लोग इतने व्यस्त थे कि उसके उलझे बिखरे चेहरे को देखने भर की भी उन्हें फुरसत नहीं थी| फिर विचारो का गुच्छा उसके दिमाग में और उलझने लगा| एक गहरी साँस के साथ उसने अपने आप से कहा –“हाँ ट्रेन के सामने कूद कर जान दे दूंगा|” निश्चित निर्णय के साथ वो तेज़ कदमो से स्टेशन की ओर बढ़ जाता है| और भीड़ में भी खुद में सिमटा अपने आप से बातें भी करता जा रहा था ‘कोई नहीं जो इस मुसीबत के वक्त मेरा साथ दे हाँ लोग कहेंगे अपने पिता की तरह कायर होकर भाग गया, तो क्या ! कोई आया ऐसे वक़्त समझने मुझे, अपने पिता के डूबे व्यवसाय को उबारने में ढेरों क़र्ज़ के बोझ से लदा हूँ माँ,पत्नी बच्चो के आगे निसहाय सा मैं कुछ नहीं कर पा रहा, अब नहीं सहा जाता, कोई मदद का हाथ नहीं जो इस वक़्त संभाले मुझे|’

अब मुकेश जल्दी जल्दी रेलवे स्टेशन के अन्दर गया| वो पहले प्लेटफ़ॉर्म की ओर बढ़ ही रहा था कि एक बूढ़ा भिखारी उसे घेर लेता है| “बेटा – कुछ दे दो – भूखा हूँ – दे दो बेटा – भगवान तुम्हारा भला करेगा – गरीब को एक रुपया दोगे भगवान् तुम्हे लाख रुपया देगा- दे दो बेटा – इस गरीब को दे दो |”

मुकेश के ज़ेहन में अजीब की नफरत कौंध गई वो दो पल रुक कर उसे देखता है फिर दांत पीसते हुए कहता है – “भले चंगे कपड़े पहनकर भीख मांग रहे हो!” मुकेश के लाख दुत्कारने पर भी उस भिखारी ने उसका पीछा नहीं छोड़ा | आखिर पिंड छुड़ाने मुकेश अपनी जेब टटोल कर एक सिक्का निकाल कर उसकी तरफ बढ़ा कर आगे चल देता है| अचानक वह देखता है कि जिस प्लेटफ़ॉर्म पर वह खड़ा है वह जगह एक तेज़ धमाके के साथ थर्रा उठी| हवा में कुछ ही देर में काला धुँआ और इंसानी अंगो के चीथड़े तैरने लगे| वह बुत बना खड़ा रहा| वह इस धमाके से कुछ दूर होने के कारण प्रभावित होने से बच गया पर उन लाशों के झुण्ड में वह खड़ा आंखे फाड़े सब देख रहा था|

उसने सारी प्रक्रिया अपनी आँखों से देखी| धमाका होना| लाशों का बिछना | चारों ओर अफरा – तफरी मचना| लोगों का भागना| पुलिस का आना| एम्बुलेंस का आना| फिर सुरक्षाकर्मियों से घिरे नेता का आना| सब कुछ इतना जल्दी जल्दी हो गया कि मुकेश कुछ समझ नहीं पाया| वह अभी भी हैरान – परेशान उन लाशों को आंखे फाड़े देख रहा था कि वह एक आवाज़ सुनता है|

“हमें बहुत दुःख है इस घटना का – इस समय पूरा देश आप लोगों के साथ है – मैं घोषणा करता हूँ कि मरने वालों को एक एक लाख और घायलों को पचास हज़ार दिए जाएँगे -|’

मुकेश ने सुना वह हैरान सा उन लाशों के झुण्ड को देखे जा रहा था| फिर एकाएक उसकी नज़र एक जगह टिक जाती है| वह अब एक लाश को गौर से देखता उसी ओर झुक जाता है|

“पिताजी – आप मुझे कहाँ अकेला छोड़ कर चले गए – पिताजी |’

वह आंसुओं से भीगा रोता हुआ झुका रहता है| एक व्यक्ति उसके पास आता है और लाश की पहचान का ब्यौरा मांगता है| वह जल्द ही चुप होकर पुनः रोने लगता है| वह आदमी लिखकर चला जाता है फिर वहां से उठते हुए मुकेश उस लाश को देखता है| वह लाश उसी भिखारी की थी जिसने अपनी कही बात सिद्ध कर दी थी| उसकी लाश पर वह दो आंसू टपका कर वह उस मरने वाले को अंतिम श्रद्धान्जली दे देता है|


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