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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



बचपन


सुशांत सुप्रिय


                 
दशकों पहले एक बचपन था 
बचपन उल्लसित, किलकता हुआ 
सूरज, चाँद और सितारों के नीचे 
एक मासूम उपस्थिति

बचपन चिड़िया का पंख था 
बचपन आकाश में शान से उड़ती 
रंगीन पतंगें थीं 
बचपन माँ का दुलार था 
बचपन पिता की गोद का प्यार था

समय के साथ 
चिड़ियों के पंख कहीं खो गए 
सभी पतंगें कट-फट गईं 
माँ सितारों में जा छिपी 
पिता सूर्य में समा गए 

बचपन अब एक लुप्तप्राय जीव है 
जो केवल स्मृति के अजायबघर में
पाया जाता है 
वह एक खो गई उम्र है 
जब क्षितिज संभावनाओं 
से भरा था 

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