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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



मेरे घर अब गौरैया नही आती ।


सपना परिहार


 
जहाँ भोर का प्रारंम्भ 
उसके करलव से होता था
संग उसके पूरा समूह होता था 
अब दूर तक उसकी आवाज सुनाई नही आती ,
मेरे घर अब गौरैया नही आती ......
कभी रोशनदान तो कभी पंखे पर उड़ आती थी 
रसोई घर में थोडा खाना मुँह में भर ले जाती थी 
भरी बाल्टी में से वो अब पानी पीने नही आती,
मेरे घर अब गौरैया नही आती ......
घर के किसी कौने में वो  घोंसला बनाती थी 
न जाने कहाँ -कहाँ से घास और तिनका बीन लाती थी
बिखरे तिनके वो अब उठाने नही आती ,
मेरे घर अब गौरैया नही आती .......
न जाने क्या भूल हुई मुझसे
शायद गौरैया रूठ  गयी  मुझसे 
अब तो अपनी इक झलक दिखाने भी नही आती ,
मेरे घर अब गौरैया नही आती ......
     

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