Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



एक पूर्ण शून्य


रश्मि सुमन


 
मानसिक विकार की हुजूरी में
वासना की मजदूरी में
स्त्री ज़िस्म से केवल वास्ता
खुद की खीझ,घुटन व
अपनी कमजोरी दिखाने का
एकमात्र " वही " है रास्ता
प्रेम के झूठे आवरण को ओढ़
आसक्ति, मोह की लिप्सा में
नित्य करते जो तुम अभिनय
जब तुम प्रेम प्रेम लिख /लुटा रहे होते
तब भी अभिनय ही कर रहे होते
जब तुम होते स्त्री लावण्य पे मोहित 
अभिनय होता चरमोत्कर्ष पर
तुम किसी भी प्रेमिका के चरित्र में
प्राण फूँकने में असमर्थ
तुम्हारा अभिनय जीवंत नहीं
क्योंकि तुम प्रेम करते ही नहीं

स्त्री की मौन में
तमाम पीड़ाओं में
व्यवधान देता तुम जैसे पुरूषों की सहानुभूतियों के नाद

सारी सृष्टि जब वासना की अग्नि मे ध्वस्त हो जाएंगी
तब , तब भी सुनाई देंगी
इतिहास की कराहटें और उनमें
तुम जैसे पुरुषों की हिंसक, पाशविक इच्छाएं
तुम्हारी माता, पत्नि, बहन, 
बेटी, और महिला मित्र की
दुत्कार और चीत्कार
उन सबों का एकांकीपन
उनके रुदन का हहराता स्वर
सब कुछ गूँजते रहेंगे चारों दिशाओं में
इस धरती के गर्भ में
ऊपर ऊपर दिखने वाले
इतिहास के भग्नावशेष पर ....
और तब फिर वही होगा
जैसे किसी शून्य से
असंख्य शून्यों की विभक्ति के बाद
बचा शेष भी
हर अवस्था मे
एक पूर्ण शून्य ही होता.....
 

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें