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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



संतानें,अपने मरते पिता से


पीताम्बर दास सराफ "रंक"


                 
इतना तुमने साथ दिया
थोड़ा और भी दे दो ना
पल दो पल के लिये ही सही
अपना संग निभा दो ना।।1।।

देखो ये सब खड़े हुए हैं
लेके दिल में अभिलाषा
उठ जाओगे तुम पल भर में
बंधी हुई है ये आशा
इनके सर पे हाथ रखा था
थोड़ा और भी रख दो ना।।2।।

सबको प्यार मिला है तुमसे
सबके संबल तुम ही हो
ऊंगली पकड़ कर चला है कोई
सब के दिल में तुम ही हो
आज सभी कह रहे हैं तुमसे
थोड़ी आंखे खोलो ना।।3।।

ये तो सच है युगो युगो तक
कोई नहीं जी पाता है
पल दो पल के जीने को ही
युगो से बढ़कर पाता है
अपनी हँसी के सागर को
थोड़ा और लुटा दो ना।।4।।

मान और सम्मान तुम्हारा
दुनियां भुला न पायेगी
गौरवान्वित हो जायेगे जब भी
याद तुम्हारी आयेगी
हम सबको तुम फिर से अपनी
प्यारी डांट पिला दो ना।।5।।

इस जीवन का कोना कोना
लगेगा तुम बिन सूना सूना
कहीं न पायेंगे जब तुमको
होगा ये दुख दूना दूना
कैसे काटेंगे ये जीवन हम 
जाते हुए बता दो ना।।6।।

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