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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



नारी बन जा एक चिंगारी


नीतू शर्मा


 
नारी बन जा एक चिंगारी
नारी मत रह भोली भाली
घुट-घुट के जीना मत नारी
गम के आँसू पीना मत नारी ।
है सहनशील तू संस्कारी,
नारी बन जा एक चिंगारी ।।
तुझे इतना लाचार बनाया
तुझे डराया और धमकाया
कभी दहेज के लिए सताया
लालच की ज्वाला में जलाया ।
है अब प्रतिकार की बारी,
नारी बन जा एक चिंगारी ।।
किया अन्याय और अत्याचार
शादी बन गया एक व्यापार
बनी कुप्रथाओ का शिकार
यातनाएँ तुझको दी अपार ।
क्यूँ बनकर बैठी बैचारी,
नारी बन जा एक चिंगारी ।।
तू जो घर से अकेली निकली
किसी हवस का शिकार बनी
लोकापवाद की आग में जली
फिर भी तुझे बदनामी मिली ।
आखिर क्यूँ है ऐसी लाचारी,
नारी बन जा एक चिंगारी ।।
कर इस संताप का विरोध
हर अन्याय का ले प्रतिशोध
कुप्रथाओ से न हो कमजोर
जुल्म का विरोध हो पुरजोर ।
कर ले तू जंग की तैयारी,
नारी बन जा एक चिंगारी ।।
तुझ बिन ना खुशियाँ मिलेगी
तुझ बिन ना बगियाँ खिलेगी
तेरे बिना दूनियाँ है अधूरी
दूनियाँ में तू भी है जरूरी ।
तुझसे महके बगियाँ सारी,
नारी बन जा एक चिंगारी ।।

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