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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



उडा़ था एक परिंदा


नरेश गुर्जर


 
उड़ा था एक परिंदा आसमां में 
आसमां से उसको मोहब्त सी हो गई
बैठा था मैं भी निशाना लगाए
शिकार की मेरी भी आदत सी हो गई
परिंदा उडा़ पर ज्यादा दूर ना जा सका
बीच आसमां मे फिर उसकी 
एक तीर से मुलाकात हो गई
उलटता पलटता पंख फड़फड़ाता कुछ यूं गिरा
खून से उसके जमीं लाल सी हो गई
देख उसकी उजडी़ मोहब्त 
फिर ये एहसास हुआ मुझको
तेरी वजह से नरेश 
दुनिया फिर बदनाम सी हो गई

 

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