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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



समय


भास्कर चौधुरी


 

एक
मेरी बच्ची घर के अन्दर एक घर बनाती है और घर-घर खेलती है उस घर में वह मम्मी होती है पापा होती है बावजूद इसके कि अंदर वाले इस घर में वह बिल्कुल अकेली होती है उसका यह घर-घर का खेल हमारे घर लौटने के बाद भी देर तक चलता रहता है वह अपने खेल के अंत में अपने घर से हमारा परिचय कराना चाहती है और हम समय और सोने का बहाना कर परिचय अगले दिन के लिए टाल देते हैं हमारी बेटी घर-घर खेलती हुर्इ अपने घर में गहरी नींद सो जाती है।
दो
मैं देख रहा हूँ दिवाकर, समीर और संचिता को बड़े होते टीवी पर इस चैनल से उस चैनल दुगुनी-तिगुनी-चौगुनी रफ़्तार से उम्र बढ़ते लगातार - घाघ से घाघ होते पैंतरे सीखते एक से बढ़कर एक मैं देख रहा हूँ बच्चों से बचपन को ग़ायब होते छीज़ते....।

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