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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



पीड़ा चुभन की


हरिहर झा


 
खामोश है 
पीड़ा चुभन की तड़प देती राह पर।

जूझे बहुत  कुंठा मिली,  
अपमान  मिले अपनो  में 
खोपड़ी में ड्रग भरा, 
रंग  बरसे सपनो में

झर झर बहे, 
पर धूल फाँके, मरीचिका लहर लहर ।

दो नैन से टपक आँसू,  
बहाती जब नदी मुनिया। 
क्या चुनेगी? घुटन दिल की, 
या जुलम  की ,नई दुनिया

अब देख लो  ठुमका लगा  
लाती कदम  , क्यों खून पर।         
 
ऊँचे महल  में प्रतिष्ठित   
गिद्ध की  आई सेना   
कर्तव्य था, बन सहचरी  
वासना को तृप्त करना 

खिलखिलाती, 
दुख में भी कलियाँ लिये अंजुरी भर। 

 

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