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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



जिंदगी आज कितनी हैरान है


शुचि भवि


 
जिंदगी आज कितनी हैरान है
मौत का सब जगह दिखे सामान है

जान से भी रहा क़ीमती जो  कभी 
देखिये वो करे यूँ ही अपमान है

 दिख रहा चेहरे से वो तो आदमी
पशु से कम क्या मगर आज पहचान है 

कौन उसका हुआ बोले हैं देवता
आइने में जो ख़ुद से ही अंजान  है

बस किताबी रही गुफ़्तगू हर जगह
अब किसी को नहीं भाता ईमान है

आज इज़्ज़त बिना साँस करती मना
मौत ये जिंदगी से भी आसान  है

ज़िंदगी  के मेले  ऐसे हैं देखिये 
सुख व दुख की बड़ी सी एक दुकान है

ख़ुद ही ख़ुद से सदा हार जाती 'भवि'
 तुम पे रहती मगर वो  मेहरबान  है
 

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