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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



लोग साहिल पे डूब जाते हैं


देवी नागरानी


 
चोट ताज़ा कभी जो खाते हैं 
ज़ख्मे-दिल और मुस्कराते हैं

मयकशी से ग़रज़ नहीं हमको 
तेरी आँखों में डूब जाते हैं

जिनको वीरानियों ही रास आईं 
कब नई बस्तियां बसाते हैं 

शाम होते ही तेरी यादों के 
दीप आंखों में झिलमिलाते हैं

कुछ तो गुस्ताख़ियों को मुहलत दो 
अपनी पलकों को हम झुकाते हैं

तुम तो तूफाँ से बच गई देवी 
लोग साहिल पे डूब जाते हैं


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