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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



कोई हमदम नहीं


अरविन्द कुमार 'असर '


 
कोई साथी कोई हमदम नहीं है
हमारे ज़ख़्म का मरहम नहीं है

तो क्या रोने पे भी पाबन्दियाँ हैं
कहीं भी मौत पे मातम नहीं है

हमारे ग़म में तो शामिल हो बेशक
तुम्हारी आँख लेकिन नम नहीं है

यहाँ गंगा भी है जमुना भी लेकिन
हमारे शह्र में संगम नहीं है

सभी को चाहिए बदलाव लेकिन
किसी के हाथ में परचम नहीं है

धुआं नफ़रत का छाया है ज़मीं पर
कहीं भी प्यार का मौसम नहीं है

नये संगीत का है शोर कितना
नये संगीत में सरगम नहीं है

हवाएँ कुछ न कर पाएगीं इसका
दिए की लौ अभी मद्दम नहीं है

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