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वर्ष: 1, अंक14, जून(प्रथम), 2017



छोटी मछली

डॉ० कामिनी कामायनी


  

   मंगलवार की घटना से बुद्धवार सुबह से ही सन्नाटे में घिरा ,जगह जगह खामोश

   ठिठकता हुआ बिन बरसे बरसात की भांति लोगों की आँखों में ठहर गया था । जुबानें बंद थी ,हृदय हाहाकार कर रहा था । इस भीषण दर्द में किसी को कोई महान देश भक्ति के गाने नहीं सूझ रहे थे । ऐसे में वह हाँफते हाँफते सुबह सवेरे निर्धारित समय से पूर्व काम पर पहुँच गई थी । आँखें सुनी थी ,चेहरे का रंगत उड़ा हुआ था । “दीदी’कहकर कुछ पल चुप ,फिर बोली ,”हमनी के पैसे तो सरकार ने बर्बाद कर दिए न ,मुए कर्जदारों को ही दे देते भला ।अब तो पानसौटकीया ,हजार टाकिया न चलिहे।बेटी के शादी के लिए अपन उ दारू पिब्बा मर्द से छुपा के रखे थे सात हजार ही होंगे ”। दीदी ने कहा “ किसने कहा बर्बाद हो गए ? तुम्हारी मेहनत के पैसे हैं ,हां ,अब बैंक खाते में जमा करना होगा, बस”। वह कुछ आश्वस्त हुई ,दीदी ने अपने खाते में डलवा दिए थे ।

   पाँच दिन बाद वह लगभग रोती हुई आई । पहले पूछा ,अंकलजी दफ्तर चले गए न । हाँ जानकार आश्वस्त हुई ,फिर अपनी आँसू बहाती हुई बोली , “बतराजी का घर छोड़ दिया” । दीदी ने पहले ही कहा था “,बेटी की शादी तक कोई घर मत छोड़ना ,सब मदद करेंगे” । यह याद कर के बोली “हमने नहीं छोड़ा ,बस इत्ती सी बात हुई ,बोली अपना खाता खोलवा लो ,हम खाता पर ही महीने का पैसा दे दिया करेंगे” ।हम बोले, “ दीदी हम गरीब ,हमका तो पैसा हाथे में चाहिए” ,बस हमको हटा कर सपना को लगवा ली, सपना बैंक गई है उनके साथ गाड़ी पर बैठ कर ,खाता खोलवाने ”। दीदी चुप हो गई थी ,माहौल ही ऐसा हो गया,लाचार बेबस , ,अब हर , तालाब में बड़ी मछली छोटी मछली को खाने पर आमादा है ।

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