Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 1, अंक14, जून(प्रथम), 2017



खाला

शहादत


   वह मोहल्ले भर की खाला थी। बच्चे, जवान, बूढ़े और औरत-मर्द हर कोई उन्हें खाला कहता था। हालांकि वह न तो वहां की बेटी थी और न ही बहू। उनकी उम्र इतनी अधिक नहीं थी कि जवान मर्द भी उन्हें खाला कहे। खाला भी बाकी परिवारों की तरह ही वहां बाहर से आकर बसी थी। वह भी सबसे बाद में।

  वह तीस साल की एक खूबसूरत औरत थी। उनके बारे में मौहल्ले के मर्दों के बीच मशहूर था कि मौहल्ला में अगर कोई औरत ढंग की है तो वह खाला ही है। खाला कभी भी चटक रंग के या ज्यादा फिटिंग वाले कपड़े नहीं पहनती थी। वह हल्कों रंगों के ढीली कुर्ते पहनती। सिर पर हर वक्त हिजाब के शक्ल में दुपट्टे को लपेटे रहती। जो उनकी एक धार्मिक औरत की छवि बनाता था। हालांकि वह ज्यादा धार्मिक नहीं थी। लेकिन वह जितनी धार्मिक थी उतनी ही दुनियादार भी थी। साथ ही बहुत समझदार और मिलनसार भी। वह किसी अनजान इंसान से भी इस तरह मिलती जैसे वह उसे बरसों से जानती हो। ओर वह भी बिना किसी झिझक या हिचक के आसानी से उनसे अपनी बात कह देता।

  खाला की जो सबसे खास बात थी वह थी लोगों से रिश्ते बनाने का उनका हुनर। नए रिश्ते बनाने और टूटे रिश्तों को जोड़ने में तो जैसे उन्हें महारत हासिल थी। उनका मौहल्ले के हर घर में आना-जाना था। बिल्कुल उसी तरह जैसे कोई इंसान बेझिझक अपने घर में किसी भी वक्त आ-जा सकता है। लोग भी उनका इस तरह आदर करते जैसा वह अपने घर के किसी बड़े बुजुर्ग का भी नहीं करते होंगे।

  खाला ने अपने रिश्ते बनाने के इसी हुनर हुनर की बदौलत मौहल्ले की कई ऐसी लड़कियों की शादी करा दी थी जो जवान होने के बाद भी कई सालों से अच्छे रिश्ते न मिलने के कारण अपने बाप की दहलीज पर बैठी हुई थी। उन्होंने रफीकन की बेटी का घर भी टूटने के बचा लिया था, जब घर में हुए किसी झगड़े को लेकर उसका शौहर उसे उसके मायके छोड़ गया था और तलाक देने की सोच रहा था। इसी तरह जब हलीमन के दर पर आई बारात दहेज के कम होने के कारण लौटने लगी तो उसने खाला को बुला भेजा था। खाला आई थी और बजाए किसी ओर से बात करने के वह दुल्हे को अंदर वाले कमरे में चली गई थी। वहां दुल्हन भी बैठी हुई थी। पांच मिनट बाद जब वह कमरे से निकली तो दुल्हा उनके पीछा था। वह निकाह के लिए राज़ी हो गया था और उसने दहेज लेने से भी इंकार कर दिया था। तय वक्त पर निकाह हुआ था और बारात भी दुल्हन को लेकर हँसी-खुशी विदा हो गई थी।

  खाला की ऐसे ओर भी कई बातें थी जिन्हें मौहल्ले की औरतें जब एक जगह जमा होती तो आपस में उनका ज़िक्र करती। लेकिन एक वाकिये ने खाला के इस तरह के ज़िक्रों को घरों और औरतों से निकालकर मर्दों और बूढ़ों की ज़बान पर भी ला दिया था। बात यह थी कि रुकसाना की बेटी सायरा की शादी को सात साल बीत गए थे लेकिन अभी तक उसके यहां बच्चे नहीं हुए थे। उसका शौहर सभी तरह से उसके इलाज़-माजरा कराके थक चुका था और अब वह हर जगह से मायूस होकर सायरा को तलाक देकर दूसरी शादी करना चाहता था। लेकिन सायरा उससे तलाक नहीं चाहती थी। उसका कहना था कि यदि उसके बच्चे नहीं होते तो इसमें उसकी क्या खता है? रो-रोकर उसका बुरा हाल था। अपनी बेटी का यह हाल देखकर उसके बाप ने दामाद को बहुत समझाया। लेकिन जब वह किसी तरह भी राज़ी नहीं हुआ तो दहेज के सामान के एवज में उसने पांच लाख रुपये की मांग कर दी थी जिसे उसने (दामाद) ठुकराया दिया था। इसको लेकर सायरा के बाप ने पंचायत बुलाने का ऐलान कर दिया। ओर जब पंचायत बुलाई गई तो खाला को भी इस बारे में पता चला। खाला ने पंचायत में जाने से पहले सायरा के शौहर को अपने घर बुलाया था। खाला के यहां से निकलकर जब वह पंचायत

  पहुंचा तो वहां उसने न केवल सायरा को तलाक देने से इंकार कर दिया बल्कि इसके मुत्तालिक अपने ससुर से हुई नोकझोंक के लिए माफी भी मांग ली थी। जब पंचातय खत्म हुई तो किसी ने कहा था, “यह इलाके की पहली पंचायत है जो किसी घर को बर्बाद करने की जगह उसे आबाद करके उठ रही है। ओर यह सब सिर्फ-ओ-सिर्फ खाला की बदौलत हुआ है।”

  खाला का घर मस्जिद से तीसरी गली में था। छोटा लेकिन बहुत साफ-सुथरा। इसमें वह अपने तीन बच्चें के साथ अकेले रहती थी। उनका शौहर अहमदाबाद में राइस मील की फैक्ट्री में काम करता था। गली के सामने सड़क के उस तरफ एक आलीशान मकान ओर था। बहुत बड़ा और शानदार। वह खाला की बड़ी बहन खुशमिदा का घर था। हालांकि वह मकान अधिकांशतः बंद ही रहता। क्योंकि खाला की बहन अपने बच्चें को लेकर अपने शौहर के पास अहमदाबाद में रहती थी जहां उनका कपड़ों का कारोबार था। वह उस मकान में बस ईद-त्यौहार, रिश्तेदारों की शादियों या फिर बच्चों की छुट्टी में ही रहने आती थी। ओर वहां दस-पंद्रह दिन बीता कर फिर चली जाती थी। इस दौरान मकान की साफ-सफाई हो जाती और जो कुछ मरम्मत का काम होता उसे भी करा लिया जाता।

  खुशमिदा जब अपने मकान में रहने आती तो खाला मानो अपनी रोज़ की ज़िंदगी से ब्रेक ले लेती। वह लोगों से मिलना जुलना कम कर देती और जितने दिन खुशमिदा वहां रहती अपना सारा समय उसी के साथ बिताती। इस दौरान वह दोनों बहनें साथ-साथ खरीदारी करने जाती, आस-पास की रिश्तेदारियों में घूम आती या फिर कहीं ओर बच्चों समेत घूमने चली जाती।

  खुशमिदा के सात बच्चे थे। पांच बेटियां और दो बेटे। बड़ी बेटी की शादी हो गई थी। और अब उसका इरादा एक बेटे और बेटी की साथ में शादी करने का था। बेटे के लिए तो उन्होंने एक लकड़ी पसंद भी कर ली थी। लेकिन बेटी के लिए कोई अच्छा लड़का नहीं मिल रहा था। इस बार ईद पर जब खुशमिदा अपने मकान में आई तो उसने खुर्शीदा (खाला) से रिहाना (बेटी) के लिए कोई अच्छा लड़का तलाश करने के लिए कहा था।

  ईद के हफ्ते भर बाद ही खुशमिदा चली गई थी। उसके जाने के बाद खाला ने दो-चार जगह लड़के देखे। लेकिन कोई भी उनका समझ में नहीं आया। एक-दो उनकी समझ में आए भी तो उन्होंने उन्हें खुशमिदा के आने पर देखने के लिए कह दिया।

  ईद-उल-जुहा (बकरा-ईद) का वक्त नज़दीक आ रहा था और लोग हज़ पर जाने की तैयारी कर रहे थे। मौहल्ले में अच्छी-खासी गहमा-गहमी का माहौल था। उन्हीं दिनों खाला की ननद का बेटा हमद, जो अपने मामू के साथ अहमदाबाद में ही काम करता था वह खाला के घर आया था... उसके साथ रिहाना भी थी। रिहाना ने उससे अपने माँ-बाप के खिलाफ जाकर हमद से निकाह कर लिया था। इसलिए उसके माँ-बाप ने उसे खूब मारा था और महज एक जोड़ी कपड़ों में जिन्हें वह उस वक्त पहने हुए थी हमद के हवाले कर दिया था। वह भी उसे उसी हाल में लेकर वहां से चला आया था। उसी शाम खाला के शौहर का फोन आया था और उन्होंने खाला को उन दोनों को कुछ दिन अपने पास रखने और फिर कुछ रुपये देकर विदा करने के लिए कहा था।

  खाला ने बिल्कुल वैसे ही किया जैसे उन्हें उनके शौहर ने कहा था। लेकिन इससे खुशमिदा ने इस पूरे घटनाक्रम का जिम्मेदार खाला को ठहरा दिया। उसने खाला पर अपने बेटी को बहकाने का इल्ज़ाम लगाया था और उनसे अपने सभी ताल्लुकात खत्म कर लिए थे। इसके बाद वह ईद (ईद-उल-जुहा) पर अपने मकान पर भी नहीं आई थी। जब मौहल्ले वालों को इस बारे में पता चला तो लगभग सभी ने एक जैसी ही बातें कही थी, “इसमें घबराने वाली कोई बात नहीं है... खाला इस रिश्ते को फिर से जोड़ लेगी... वह भी इस तरह कि यह पहले से कहीं ज्यादा मजबूत और रस-भरा होगा।”

  लोगों की बातें सुनकर लगता था कि जैसा वह सोच रहे वैसे ही होगा। खाला की बातों और उनके हावभाव से भी उम्मीद बंधती थी कि खाला फिर से अपनी बहन के सभी गिले-शिकवों को खत्म कर दोबारा रिश्ता बना लेंगी।

  ओर फिर दिन बीतने लगे। हफ्तों से महीने... ओर महीनों से साल। साल के दरमियान खुशमिदा रिश्तेंदारों की शादियों और मय्यतों में शामिल होने के लिए आई। जिनमें खाला भी सपरिवार शरीक हुई थी। फिर वह ईद पर अपने मकान में भी आई। इसके बाद ईद-उल-जुहा पर भी और उसके बाद फिर से रिश्तेदारों की नए शादियों और उनकी मय्यतों में भी। खाला भी इन सब जश्नों और मातमों में बराबर शामिल होती रही। लेकिन इस दौरान किसी ने भी खुशमिदा को खाला से बात करना तो दूर उनकी ओर देखते भी नहीं पाया था।

  इसी तरह कई साल बीत गए। एक दिन जब मौहल्ले की कई औरतें एक जगह जमा थी तो पहले तो वह इधर-उधर की बातें करती रही और फिर जब किसी ने खाला का ज़िक्र शुरु किया तो बात खुशमिदा के साथ उनके रिश्ते तक भी पहुंच गई। इस बात का ज़िक्र आते ही उनमें से किसी औरत ने कहा था, “यह ज़रूरी नहीं कि इंसान हर इम्तिहान में पास हो... बाज दफा दूसरों को पास करा देने वाला इंसान खुद के इम्तिहान में इतनी बुरी तरह फेल होता है कि वह मुद्दतों तक संभल नहीं पाता...!”

  इसी दौरान वहां से गुज़र रही खाला, जिन्होंने उसकी बात को सुन लिया था... इस तरह ठिठक कर रुक गई जैसे उन्हें ठोकर लग गई हो।

www.000webhost.com

कृपया अपनी प्रतिक्रिया sahityasudha2016@gmail.com पर भेजें