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वर्ष: 1, अंक 14, जून(प्रथम), 2017



"प्यार तुम्हारा"

डॉ योगेन्द्र नाथ शर्मा "अरुण"


रोम-रोम पुलकित है प्रियतम,  
आज तुम्हारा प्यार मिला है!
मादक - सा उपहार मिला है!!
                       
   जीवन के पतझर में प्रियतम,
     आए हो तुम बनकर सावन!
        साध युगों की पूर्ण हुई है,
           पाया प्यार तुम्हारा पावन!!

जाने कब से मैं तड़प रहा था,
आज ह्रदय का कमल खिला है!
आज  तुम्हारा  प्यार  मिला है!!

   प्रीत सलोनी पाकर प्रियतम,
      लगा कि मैं वरदान पा गया!
         भटक रहा था मरुथल में मैं,
            अब जैसे विश्राम पा गया!!

तुम ने आशा दे दी है ऐसी,
आज किसी से नहीं गिला है!
आज तुम्हारा प्यार मिला है!!

  लक्ष्य सामने देख रहा हूँ,
    पार मुझे जाना है प्रियतम!
     हाथ तुम्हारा पकड़ चलूँगा,
      अपना तुमको है माना प्रियतम!!

मुक्ति तुम्ही दिला सकते हो,
जीवन  एक  अबूझ किला है!
आज तुम्हारा प्यार मिला है!!
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