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वर्ष: 1, अंक 14, जून(प्रथम), 2017



कैसे ऊंचाई नापते है

अजित पाण्डेय 'शफ़क़'

बड़ा मुश्किल है ये कहना कैसे ऊंचाई नापते है।
जिस्म का क़द देखते है, या परछाई नापते है।

बेहतर है पूरा झूट ही अब कह दिया जाए,
यहाँ सब अपने हिसाब से सच्चाई नापते है।
जिस्म का क़द देखते है, या परछाई नापते है।

सर ए बाजार सस्ता न लगु अपने बच्चो को,
पहले चल ज़रा बाजार की महंगाई नापते है।
जिस्म का क़द देखते है, या परछाई नापते है।

पहाड़ो कैसा मै बौना कहु खामोश दरिया को,
ये दरिया है, दरियाओं की गहराई नापते है।
जिस्म का क़द देखते है, या परछाई नापते है।
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